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आत्म-स्वरूप/self-image

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  'संसरतीति संसार:', ' गच्छतीति जगत्', के अनुसार नित्य गतिशील का नाम ही संसार है । यह संसार माया से बना है । माया एक ईश्वरीय  अनादि शक्ति है । वेद कहता   है- मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।   तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ।। ( श्वे ० ४ - १० ) अर्थातं माया खिलवाड़ या वहम नहीं है   अपितु एक शक्ति है ' अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां' .......   इस वेदमंत्र के अनुसार एवं  ' दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया'   इस गीतोक्ति के अनुसार  ' सो दासी रघुवीर की समुझे मिथ्या सोपि '  इत्यादि रामायण के अनुसार , मा या ईश्वरीय शक्ति है । इसी से यह संसार बना है । अतएव मन एवं सांसारिक पदार्थ सजातीय होने के कारण एक दूसरे के सहयोगी हैं । ईश्वर दिव्य है,   अतएव मन का आकर्षण स्वभावतः ईश्वर की ओर नहीं होता ।   आत्म - स्वरूप .......   अब आप यह विचार करें कि आप कौन हैं एवं आप अपना आनन्द चाहते हैं य...