ईश्वर का स्वरुप / God's Form

'नावेद्रविन्मनुते तं ब्राहान्तम्' अर्थात जो वेद नहीं जानता वह ईश्वर को नहीं जान सकता|

अतः सर्वप्रथम वेदों में ही चल कर देखा जाये | वेद कहता है-

'यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः |

 अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्’ ||

अर्थात जो यह समझता है कि ईश्वर समझने का विषय है वह नहीं समझता एवं जो यह समझता है कि ईश्वर समझने का विषय नहीं हैं वह ईश्वर को समझता है | अर्थात ईश्वर को कोई नहीं समझ सकता | दूसरी ओर वेद कहता है-

' इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टि: ' |

अर्थात यदि इसी मानव-देह में ईश्वर को जान लिया, तब तो ठीक है अन्यथा महती हानि हो जाएगी क्योंकि यह मानवदेह देवताओं को भी अप्राप्य है |

वेदों ने ईश्वर के न जान सकने के कई कारण बताये हैं | एक कारण तो यह है कि-

'इन्द्रियेभ्यः परा ह्यार्था अर्थेभ्यश्च परं मनः |

मनसस्तु परा बुध्दिर्बुद्धेरात्मा महान् परः ||

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः |

पुरुषान्न परं किञ्चित सा काष्ठा सा परा गतिः’ ||

अर्थात इन्द्रियों से परे इन्द्रियों के विषय हैं, विषयों से परे मन है, मन से परे बुद्धि है, बुद्धि से परे जीव है, जीव से परे माया है, माया से परे ब्रह्म है | भावार्थ यह कि इन्द्रिय, मन और बुद्धि से ईश्वर सर्वथा परे है, अतएव इन्द्रिये, मन, बुद्धि ग्राह्य नहीं हो सकता, जब कि जीव के पास यही एकमात्र साधन हैं |

दूसरा कारण यह है कि " दिव्योह्यमूर्ताः पुरुषः " अर्थात ईश्वर दिव्य है एवं इन्द्रिय, मन, बुद्धि प्राकृत हैं | अतएव इन्द्रिय, मन, बुद्धि दिव्य ईश्वर को नहीं ग्रहण कर सकते |

तीसरा कारण यह है कि-

"तमेव भान्तमनुभाति सर्व तस्य भासा सर्वमिदं विभाति " |

अर्थात वह प्रकाशक है | उससे इन्द्रिय, मन, बुद्धि प्रकाशित होते हैं | अतएव प्रकाशक ईश्वर से प्रकाशित इन्द्रिय, मन, बुद्धि,अपने प्रकाशक की प्रकाशिका कैसे हो सकती हैं | अतएव वह सर्वथा अज्ञेय हैं |

चौथा कारण-

"यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् |

 तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते || " (वेद )

अर्थात उसकी प्रेरणा से इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अपना-अपना कार्य करने में समर्थ होते हैं अतएव प्रेर्य इन्द्रिय, मन, बुद्धि,प्रेरक ईश्वर को ग्रहण करने में असमर्थ हैं |इसके अतिरिक्त ईश्वर दो विरोधी धर्मो का अधिष्ठान है |

अणोरणीयान् महतो महीयानात्मा गुहायां निहितोsस्य जन्तोः |

तमक्रतुं पश्यति वीतशोको धातु: प्रसादान्महिमानमीशम् || (वेद)

अर्थात आप जितनी छोटी कल्पना परमाणु आदि की कर सकते हैं ईश्वर उससे भी छोटा है एवं आप जितनी बड़ी कल्पना आकाशादि की कर सकते हो, ईश्वर उससे भी बड़ा है| छोटे से छोटा होना इसलिए अनिवार्य है क्योंकि उसे छोटी से छोटी वस्तु में भी व्याप्त होना है और बड़े से बड़ा होना इसलिए आवश्यक है कि सबको अपने भीतर स्थिर रखना है एवं प्रलय द्वारा अपने में प्रविष्ट कराना है | यदि इतना ही होता कि वह छोटा होता तो समझ में आता, यदि बड़ा होता तो समझ में आता | सम्भव है दोनों स्थितियाँ भी समझ में आ जातीं किन्तु वेद कहता है कि-

" नेति नेत्यस्थूलमनणु: "

अर्थात न वह छोटा है न बड़ा है | तब फिर उसे कैसे समझा जाये |

पाँचवा कारण-

"अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् |

अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्धद || " (क० १-२-१४)

अर्थात ईश्वर धर्म से परे है,अधर्म से परे है, कार्य से परे है एवं कारण से भी परे है |

६. पुनश्च-

"सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् |

 सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं सुह्रत || " (श्वे० ३-१७)

ईश्वर समस्त इन्द्रियों आदि से रहित है, किन्तु समस्त इन्द्रियादिकों के विषय को ग्रहण करता है | यहाँ तक कि-

"अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षु: स श्रृणोत्यकर्ण: |

 वेत्ति वेध्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्रयं पुरषं महान्तम् ||                                                                                                                      (श्वे३-१९)

अर्थात उसके पैर नहीं है किन्तु दौड़ता है, उसके हाथ नहीं हैं किन्तु पकड़ता है, उसके आँख नहीं हैं किन्तु देखता है, उसके कान नहीं हैं किन्तु सुनता है, वह सब कुछ जानता है, उसे कोई नहीं जानता |

दूसरी ओर-

"सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्ष: सहस्रपात् |

स भूमिध्सर्वतस्पृत्वात्यतिष्ठद्दशाड्गुलम् || (श्वे० ३-१४)

अर्थात उसके अनन्त सर हैं, अनन्त आँखें हैं, अनन्त पैर हैं, आदि | अस्तु, अगर बिना पैर का होता तो हम उसे लँगड़ा समझ लेते किन्तु दौड़ता है तब लँगड़ा कैसे समझ लेंगे | इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों की समस्या है |

८. पुनश्च-

"तदेजति-तन्नैजति तद्दूरे तद्धन्तिके |

 तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः || "

अर्थात वह चलता है, वह नहीं चलता है, वह दूर से भी दूर है एवं समीप से भी समीप है, वह सब के भीतर है एवं सब के बाहर है |

९. पुनश्च-

"अजायमानो बहुधा विजायते, तस्य योनिं परिपश्यन्ति धीराः |"

अर्थात वह अजन्मा भी है एवं अनन्तानन्त जन्म भी धारण करता है |

१०.पुनश्च-

सोsकामयत | बहुस्यांप्रजायेयेति | स तपोsतप्यत | स तपस्तप्त्वा इदं

सर्वमसृजत, यदिदं किञ्च | तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् | तदनुप्रविश्य     सच्च त्यच्चाभवत् | निरुक्तं चानिरुक्तं च | निलयनं चानिलयनं च | विज्ञानं चाविज्ञानं च | सत्यं चानृतं च सत्यमभवत् | यदिदं किं च | तत्सत्यमित्याचक्षते | तदप्येषश्लोको भवति ||  

(तैत्तिरीय उपनिषद्)

अर्थात उसने इच्छा की एवं तपस्या की जिससे सृष्टि हुई | भावार्थ यह कि वह सृष्टिकर्ता है | एवं-

" अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता त्रयं यदा विन्दते ब्रह्मेतत् | "                                                                                                             (श्वे० १-९)

अर्थात वह कुछ नहीं करता | इसी आशय से गीता भी कहती है-

"मत्त: परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय |

 मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव || " (गीता ७ - ७ )

"मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना |" (गीता ९ - ४)

"गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् | " (गीता ९ - १८ )

"प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् |

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते || " (गीता १० - ८ )

"परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् |

 पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् || (गीता १० - १२ )

 "अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन |

विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् || (गीता १० - ४२ )

इसी आशय से वेदव्यासजी कहते हैं-

"द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च |

वसुदेवात्परो ब्रह्मन्न चान्योर्थोस्ति तत्त्वतः ||" (भा० २-५-१४ )

"सर्वं पुरुष एवेदं भूतं भव्यं भवच्च यत् |

तेनेदमावृतं विश्वं वितस्तिमधितिष्ठति || (भा० २-६-१५)

"पादेषु सर्वभूतानि पुंसः स्थितिपदो विदुः |

अमृतं क्षेमभयं त्रिमूर्ध्नोsधायि मूर्धसु || " (भा० २-६-१८ )

वेदव्यास की एक परिभाषा तो बहुत ही विलक्षण है-

"यत्र येन यतो यस्य यस्मै यद् यद् यथा यदा |

 स्यादिदं भगवान् साक्षात् प्रधानपुरुषेश्वरः ||" (भा० १०-८५-४)

अर्थात जो विश्वरूप हो, जिसको विश्व-व्यापर प्राप्त हो, जिससे विश्व की रक्षा होती हो, जिसके लिए विश्व हो, जिससे विश्व उत्पन्न हुआ हो, जिसका विश्व हो, जिसमे विश्व स्थित हो, ऐसा माया एवं जीवों का स्वामी ईश्वर है | रामायण भी यही कहती है-

" राम स्वरुप तुम्हार वचन अगोचर बुद्धि पर |

अविगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम वद ||

जग पेखन तुम देखन हारे | विधि हरि शंभु नचावन-हारे ||

तेउ न जानहिं मरम तुम्हारा | और तुम्हीं को जाननहारा ||

राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी | मत हमार अस सुनहु सयानी || "

भावार्थ यह कि ईश्वर सर्वथा अदृष्ट, अव्यवहार्य, अलक्षण, अव्यपदेश्य, अचिन्त्य है जैसा कि वेद कहता है-  " अदृष्टमव्यवहार्यम् "

वेदव्यासानुसार उसे ब्रह्मा, शंकरादि भी नहीं जानते-

"नाहं न यूयं यहृतां गर्ति विदुर्न वामदेवः किमुतापरे सुराः |

तनमायया मोहित बुद्दयस्त्विदं विनिर्मितं चात्मसमं विचक्ष्महे || "                                                                                                     (भा० २-६-३६-)

वेद कहता है, ऐसा ईश्वर तीन स्वरुप वाला है-

"एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नातः परं वेदितव्यं हि किंच्चित |

भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्व प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत्  || "                                                                                                            (श्वे० १-१२ )

अर्थात तीन प्रकार के ईश्वर को जानना होगा | तब माया निवृत्ति होगी | प्रथम भोक्ता ब्रह्म, द्धितीय भोग्य ब्रह्म, तृतीय प्रेरक ब्रह्म | प्रेरक ब्रह्म के विषय में ऊपर बता ही चुका हूँ | भोक्ता ब्रह्म के विषय में वेद कहता है-

"आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु |

बुद्धि तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च || " (क० १-३-३)

"इन्द्रियाणि ह्यानाहुर्विषयां स्तेषु गोचरान् |

आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः || " (क० १-३-४)

"विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः |

सोsध्वनः पारमाप्नोति तद्दिष्णो: परमं पदम् || " (क० १-३-९)

अर्थात आत्मा रथी है, शरीर रथ है, बुद्ध सारथी है, मन लगाम है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं, ऐसे आत्मेन्द्रिय-मन-बुद्धि-युक्त तत्व को भोक्ता-ब्रह्म कहा जाता है | भोग्य-ब्रह्म के विषय में वेद कहता है-

"अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्री: प्रजाः स्रजमानां सरूपाः |

अजो ह्येको जुषमाणोsनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोsन्यः || "                                                                                                   (श्वे० ४-५ )

अर्थात वह भी अजा है | इसका भी कभी प्रारम्भ नहीं है , अनादि अनन्त है, उसे माया कहते हैं | यह तीन गुणों ( सत्व, रज और तम ) वाली है किन्तु ऊपर कहा जा चुका है कि ये तीनों बुद्धि से परे हैं |

अब विचारणीय यह है कि-

बुद्धि से भी जब ईश्वर अग्राह्य है तो हम कैसे आशा करें कि वह हमारी समझ में आ जाएगा और बिना जाने विश्वास न होगा, बिना विश्वास के उसकी प्राप्ति न होगी एवं बिना उसकी प्राप्ति हुए परमानन्द का परम चरम लक्ष्य न हल होगा | वेद कहता है-

"तस्य योनिं परिपश्यन्ति धीराः" 

" वेदाह्मेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् |

तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विध्यतेsयनाय || "

      (श्वे० ३-८ )

अर्थात उस ईश्वर को जानने वाले भी हुए हैं | एक ओर ईश्वर को सर्वथा अज्ञेय, अदृष्ट आदि कहा जाता है और दूसरी ओर दृष्ट एवं ज्ञेय कहा जाता है, यह समस्या कैसे हल हो ? इस पर विचार अगले प्रकरण "भगवत्कृपा" पर किया जायेगा |......

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लेखक:- जगद्गुरु श्री १००८ स्वामी कृपालु जी महाराज |






||जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज ||



 


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