जीव का चरम लक्ष्य / ultimate goal of life / الهدف النهائي للحياة


 

विश्व का प्रत्येक जीव बिना किसी प्रयोजन के कोई कार्य नहीं करता, यह एक अनुभवसिद्ध सिद्धांत है | दर्शनशास्त्र कहता है, 'प्रयोजनमनुद्दिश्य मन्दोअपि न प्रवर्तते' अर्थात घोर से घोर मूर्ख भी बिना प्रयोजन के कोई कार्य नहीं करता | अतएव प्रत्येक कार्य का पृथक-पृथक प्रयोजन होना भी स्वाभाविक होना चाहिए, किन्तु ऐसा नहीं है | कार्य अनन्त होते हुए भी प्रयोजन एक ही है | सुनने में यह बात विचित्र सी है किन्तु विचार करने पर साधारण एवं स्वाभाविक है |

कुछ लोग कह सकते है की बिना प्रयोजन के भी तो कार्य होते है ; यथा-

'खाल बिनु स्वारथ पर अपकारी',| 'जे बिनु काज दाहिने बायें |

अर्थात दुष्ट बिना प्रयोजन के पर-अपकारी होते हैं | इसी प्रकार -

'पर उपकार वचन मन काया | संत सहज सुभाव खगराया ||

भूर्ज तरु सम संत कृपाला | परहित सेह नित विपति विसाला || '

अर्थात महापुरुष बिना प्रयोजन के परोपकार करता है एवं इसी प्रकार महापुरुषो के आराध्य परात्पर सर्वशक्तिमान भगवान भी बिना प्रयोजन के ही परोपकार करते हैं | इस प्रकार दुष्ट, संत एवं भगवान तीनो ही बिना प्रयोजन कार्य करते हैं | तब उपर्युक्त सिद्धांत तो इसी से खण्डित हो जाता है | किन्तु ऐसी बात नहीं है | इन तीनो का भी कुछ न कुछ प्रयोजन अवश्य है | यथा -

'जो काहू की देखहिं विपती, सुखी होहिं मनहु जग नृपती | '

अर्थात दूसरे को दुःखी देखकर दुष्ट को सुख मिलता है यही उसका गुप्त प्रयोजन है| इस प्रकार महापुरुष एवं भगवान् भी- 'पर दुःख दुःख , सुख सुख देखे पर '

अर्थात दूसरे के दुःख को देखकर दुखी होते हैं एवं दूसरे के सुख को देखकर सुखी होते हैं | अस्तु सुखी बनने के लिए परोपकार रूपी कार्य करते हैं | इस प्रकार पर-अपकार रूपी कार्य से दुष्ट को एवं परोपकार रूपी कार्य से संत, भगवान् को सुख मिलता है| इस प्रकार सुख-प्राप्ति-रूपी प्रयोजन सिद्ध हुआ|

संछेपतः यों समझिये की दुष्ट को तो पर-अपकार से क्षण-भंगुर सुख मिलता है , एतदर्थ वह वैसा कार्य करता है एवं संत और भगवान् को जो सदा सुखमय है, दूसरे को सुखी बनाने में सुख मिलता है, अतएव वे वैसा कार्य करते हैं | अब आप समझ गए होंगे की इन तीनो का ही मुख्य प्रयोजन सुख-प्राप्ति ही है | अब सर्वसाधारण पर विचार कीजिये | विश्व का प्राणिमात्र एकमात्र आनन्द-प्राप्ति हेतु ही प्रत्येक कार्य करता है| यदि आप कहें  की धन-पुत्र-मित्रादि अन्य प्रयोजन के लिए भी,जो अनुभव सिद्ध हैं,कर्म किया जाता है तो यह समझ लेना चाहिए की धन-पुत्रादि की प्राप्ति लक्ष्य नहीं है अपितु धन, पुत्रादि के द्धारा भी उसी अव्यक्त आनन्द की प्राप्ति का ही लक्ष्य है -

सर्वेषामपि भूतानां नृपस्वात्मैव वल्लभ: | ित्रेापत्यवित्ताधास्तद्वल्लभतयैव हि || (भा०)

इस वेदव्यासोक्ति का यही अभिप्राय है | यदि आप कहे कि जीवन ,ज्ञान स्वतंत्रता , सब पर शासन करना तथा आनन्द आदि पांच लक्ष्य कुछ दार्शनिको ने माने है , फिर एक ही लक्ष्य आनन्द-प्राप्ति कैसे सिद्ध होगा, तो वहां भी यह समझ लेना चाहिए कि अन्य जीवन-ज्ञानादि लक्ष्य उसी आनन्द-प्राप्ति के हेतु ही होते हैं | अतएव सिद्ध हुआ कि विश्व का प्रत्येक जीव,वह चाहे सर्वसाधारण हो या दुष्ट हो या महापुरुष हो या भगवान् हो, एकमात्र आनन्द के ही लक्ष्य से कार्य करता है | यह पृथक बात है कि यदि आनन्द-प्राप्ति रूपी लक्ष्य का मार्ग सत्य है तो सत्यानन्द प्राप्त होगा, यदि मार्ग असत्य है तो असत्यानन्द अर्थात दुःख ही प्राप्त होगा |

अब इस एक आनन्दप्राप्ति के लक्ष्य पर गम्भीर विचार कीजिये, क्योकि जब विश्व में सर्वत्र वैषम्य और वैमत्य है तो अल्पज्ञ से लेकर सर्वज्ञ तक, बिना किसी के सिखाये ही एकमात्र आनन्द ही क्यों चाहता है, इसका कोई महान वैज्ञानिक रहस्य अवश्य होगा| हाँ, वह रहस्य यह है कि-

'आनन्दो ब्रह्मोति व्यजानात, अनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि

जायन्ते, आनन्देन जातानि  जीवन्ति, आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति' |

इस वेदोक्ति के अनुसार ब्रह्म आनन्दस्वरूप है | यहाँ तक कि-

'आनन्द एवाधस्तात् आनन्द उपरिष्टात् आनंद: पुरस्तात् आनंद:

पश्चात् आनंद उत्तरत: आनंदो दक्षिणत: आनंद एवेदं सर्वम्’ |

के अनुसार उसके नीचे , उसके ऊपर, उसके पूर्व, उसके पश्चिम, उसके उत्तर, उसके दक्षिण, उसके बहार, सर्वत्र आनन्द ही आनन्द लबालब भरा है| आप कहेंगे की यह तो आनन्दस्वरुप ईश्वर की बात हुई, पर यहाँ तो प्रश्न जीवो का है| पर बात यह है की "ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:" इस गीतोक्ति के अनुसार जीव उसी आनन्दस्वरुप ब्रह्म का अंश है, अतएव अपने अंशी के स्वाभाव से युक्त होने के कारण स्वभावत: प्रत्येक जीव एकमात्र आनन्द ही चाहता है| वस्तुतस्तु करोड़ों कल्प प्रयत्न करके भी कोई जीव आनन्द-प्राप्ति रूपी लक्ष्य से च्युत नहीं हो सकता|

कुछ दार्शनिक इसी आनन्द-प्राप्ति के लक्ष्य को आत्यंतिक-दुःखनिवृत्ति रूप में प्रतिपादित करते है| यथा, सांख्य कहता है- "दुःखत्र्याभिघातात् जिज्ञासा तदभिघातके हेतौ" अर्थात दुःख निवृत्ति ही जीव का चरम लक्ष्य है| वह दुःख तीन प्रकार का होता है-

१. आध्यात्मिक (दैहिक), २. आधिभौतिक, ३. आधिदैविक

१. आध्यात्मिक अथवा दैहिक दुःख दो प्रकार का होता है- प्रथम शारीरिक ज्वरातिसारादि रोगो से उत्पन्न दुःख एवं द्वितीय मानसिक काम, क्रोध, लोभादि से उत्पन्न दुःख |

२. आधिभौतिक- मनुष्य, पशु एवं स्थावरादि से उत्पन्न दुःख|

३. आधिदैविक- शीतोष्ण वर्षादि से उत्पन्न दुःख|

पुनः संख्य दर्शन कहता है- "कुत्रापि कोsपि सुखी तदपि दुखशबलमिति दुखपक्षेनि:क्षिपन्ते विवेचका:" अर्थात संसार में सुख नहीं है| यदि कोई कहीं सुखी दिखाई भी पड़ता है तो वह भी भ्रान्ति मात्र है, क्योकि सांसारिक सुख अनित्य, सीमित एवं परिणामी होता है|

इस प्रकार दुःख निवृत्ति का लक्ष्य भी दूसरे शब्दों में आनन्द-प्राप्ति का ही घोतक है| इतना ही नहीं, विश्व का प्रत्येक जीव ईश्वरीय सम्पत्तियों से भी बिना किसी के सिखाये पढ़ाये ही स्वभावतः प्रेम करता है, यथा सत्य, अहिंसा, अक्रोध, क्षमा, दया आदि| आप कहेंगे कि विश्व में इने-गिने जीवो अर्थात महापुरुषों को छोड़ कर कोण ऐसा है जो सत्य, अहिंसा आदि से प्रेम करता हो ? पर ऐसा कहना भोलापन है करोड़ो कल्प प्रयत्न कर के भी कोई मूर्ख से मूर्ख जीव भी सत्यादि के विरुद्ध असत्य, चोरी, दुराचारादि से प्रेम नहीं कर सकता| इसे यों समझिये-जैसे यदि कोई चोर यह कहे कि मै चोरी को अच्छा मानता हूँ तो उसकी कोई प्रिय वस्तु चुरा लीजिये| फिर देखिये उसे ऐतराज होता है या नहीं| यदि होता है तो क्यों ? जब उसका सिद्धान्त चोरी करना है तो उसकी चोरी होने पर उसे दुःख क्यों होता है ? यदि मिथ्याभाषी से कोई झूठ बोलता है तो उसे कष्ट क्यों होता? यदि किसी परपीड़नशील को कोई पीड़ित करता है तो उसे कष्ट क्यों होता है ? इससे सिद्ध हुआ कि प्रत्येक जीव ईश्वरीय सम्पत्ति से भी प्रेम करता है और इसका भी प्रमुख विज्ञान वही है की जीव उसी ईश्वर का अंश है, अतएव यह उसका स्वाभाविक स्वाभाव है की वह ईश्वरीय सम्पत्तियों से भी प्रेम करे|

अतः यह भी सिद्ध हुआ कि जीव परमानन्द प्राप्ति के साथ-साथ परमानन्द प्राप्ति के गुणों को भी लक्ष्य बनाये हुए है| यह सब स्वाभाविक रूप से ही है|

अब यह विचार करना है कि क्या कोई ऐसा भी जीव हो सकता है कि जो न दुःख चाहे न सुख अर्थात् कुछ क्रिया ही न करे ? ऐसा असम्भव है | गीता के अनुसार-

"न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्"

अर्थात कोई भी जीव एक क्षण को भी अकर्मा नहीं रह सकता| आनन्द-प्राप्ति के हेतु प्रतिक्षण कर्म करना यह जीव का स्वाभाव है| साथ ही यह स्वाभावसिद्ध क्रिया तब तक चलती रहेगी जब तक वह वास्तविक परमानन्द न प्राप्त कर लेगा|

इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि विश्व का प्रत्येक जीव एक-मात्र आनन्द ही चाहता है एवं उसी आनन्द की प्राप्ति के हेतु प्रतिक्षण प्रयत्नशील भी है| अब यह विचार करना है की यह प्रयत्न कब से चल रहा है|

वेदों के अनुसार-

"ज्ञाज्ञोो द्धावजावीशनीशावजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता |

अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्याकर्ता त्रयं यादाविंदते ब्रह्मेतत्"||  (श्वे०१,१,९)                                                                                                                 अर्थात प्रत्येक जीव अज  है| उसका प्रारम्भ कभी नहीं हुआ |

"ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः"

इस गीतोक्ति के अनुसार भी जीव सनातन है| भावार्थ यह कि यदि आप से कोई पूछे कि आप कब से हैं तो सीधा सा उत्तर है कि जब से भगवान् है | यदि वह पूछे की आपके भगवान् कब से हैं तो सीधा उत्तर है कि जब से हम हैं | यदि वह पुनः पूछे कि आप एवं  भगवान् कब से हैं, तो स्पष्ट उत्तर है कि जब से "कब" भी नहीं था, तब से हैं| अर्थात कब यानी काल तो हमारे एवं भगवान् के पश्चात् जी उत्पन्न हुआ अतएव वह काल हम लोगों का निश्चय नहीं कर सकता, अतः सब अनादि हैं | एक बात और भी विचारणीय है कि -

"नासतो विधते भावो नाभावो विधते सतः |

उभयोरपि दृष्टोsन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः" || (गीता)

इस गीतोक्ति के अनुसार किसी सत्ता का आभाव नहीं हो सकता, अर्थात यदि हम आज हैं तो पहले भी सदा से थे| यदि आज न होते तो पहले भी कभी न होते| इसलिए भी हम सब- 

"न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा ना भूयः |

अजो नित्यः शाश्वतोsयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे  ||

इस गीतोक्ति के अनुसार हम नित्य, शाश्वत एवं अजन्मा हैं | अब यह सिद्ध हो गया कि हम लोग अनादिकाल से अर्थात् अनन्तकाल से उसी एक परमानन्द-प्राप्ति के हेतु प्रतिक्षण प्रयत्नशील हैं | किन्तु आश्चर्य है कि  अनन्तानन्त जन्मो से अनवरत प्रयत्न करने के पश्चात भी अध्यावधि आनन्द नहीं प्राप्त हुआ| इसका प्रमुख रहस्य क्या है ?

वास्तव में आनन्द इस कारण नहीं प्राप्त हुआ क्योकि अभी हम लोगो ने यही नहीं समझा एवं निश्चय किया कि आनन्द क्या है ? कहा है ? कैसे मिलेगा ? अब आइये विचार करें कि आनन्द क्या है ?

वेद के अनुसार-  "यो वै भूमा तत्सुखम्"

अर्थात आनन्द सदा अनन्तमात्रा का होता है | सीमित मात्रा का होता ही नहीं है, क्योकि आनन्द-प्राप्ति का अभिप्राय ही यह है की उसके ऊपर फिर कभी भी दुःख का अधिकार न हो सके एवं उससे बड़ा कोई आनन्द न हो| जैसे प्रकाश पर अन्धकार का अधिकार नहीं हो सकता, उसी प्रकार एक बार आनन्द प्राप्त होने पर पुनः दुःख का अधिकार नहीं हो सकता | अब यह विचार करना है की ऐसा नित्य, असीम आनन्द कहाँ है ? बस, यह प्रश्न ही बड़ा गमभीर है| इसी के उत्तर में अनन्तानन्त वादों का विवाद अनादिकाल से चल रहा है, किन्तु आप घबड़ायें नहीं, अभी निश्चय हुआ जाता है|

आनन्द-प्राप्त्यर्थ विश्व में जितने भी वादों के विवाद चल रहे हैं, उनको हम दो वादों में विभक्त कर सकते हैं , एक भौतिक-वाद एवं दूसरा अध्यात्मवाद | यदि इन दोनों वादों को हम भँली-भाँती समझ लें तो यह वाद-विवाद निर्विवाद रूप से हल हो जाये | सर्वप्रथम भौतिकवाद पर ही विचार कर डालिये |

भौतिकवादियों का कहना है कि विश्व की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलयादि सब कुछ प्राकृतिक नियमानुसार ही स्वयं होते रहते है, ईश्वर नाम का कोई तत्त्व नहीं है| ईश्वर तो बिगड़े हुए दिमाग की उपज है | ईश्वर नाम के तत्त्व को इंसान ने बनाया है, ईश्वर ने इंसान को नहीं बनाया एवं उस ईश्वर को बीच में लाना पागलपन की पहचान है | प्रिथ्वी, जल, तेज, वायु इन चार तत्वों से संसार बन गया है |

उनका कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति आनन्द चाहता आनन्द तभी प्राप्त हो सकता है जब जीव की प्रतिक्षण की वासनाओं की पूर्ति के हेतु उसका अभिलषित पदार्थ मिलते रहें | बिना इच्छाओं के अनुसार पदार्थ दिए आनन्द नहीं प्राप्त हो सकता, यह सब के अनुभव से स्वयं सिद्ध है |

किन्तु भौतिकवादी यह नहीं सिद्ध कर पाते कि क्या वासनाओं के अनुसार अभिलषित पदार्थ पाने पर वासना की पूर्ति सदा के लिए हो जाती है अथवा पुनः वासना उत्पन्न होती है | यदि पुनः दुगुनी, चौगुनी वासना उत्पन्न होती है, तब तो जलती हुई आग में घी  डालने के समान ही भोलापन सिद्ध होगा | यदि उनका यह अनुभव-सिद्ध प्रमाण है कि  इच्छापूर्ति से सुख मिलता है, तो मेरा भी यह डंके की चोट पर अनुभव- सिद्ध प्रमाण है कि  वासना-पूर्ति के पश्चात् छणभंगुर सुख ही मिलता है एवं कुछ क्षण पश्चात ही बलवती वासना की पुनः उत्पत्ति होती है | इस प्रकार पदार्थो के प्रदान करने पर वासनाओं की पूर्ति की कहीं भी सीमा नहीं है | क्या भौतिकवादियों के इतिहास में एक भी व्यक्ति ने ऐसा कहा है कि अमुक व्यक्ति को अमुक मात्रा का पदार्थ मिला था एवं उसने अपना अनुभव बताया था कि मई पूर्णकाम बन गया हूं ? यह असम्भव है | यह तो प्रतिक्षण वर्द्धमान रोग है |

जिस प्रकार खाज को खुजलाने से वर्तमान में सुखानुभूति तो होती है किन्तु पुनः उसका कितना भयंकर स्वरुप हो जाता है, उसी प्रकार अभिलषित पदार्थो के देने से, क्षणभंगुर वासना की पूर्ति से, आनन्द तो मिलता है किन्तु वह आनन्द सीमित होता है | कुछ क्षण के पश्चात् ही दूसरी वासना का विराट् स्वरुप समक्ष आ जाता है | वास्तव में सांसारिक पदार्थो द्वारा इच्छापूर्ति होने पर लोभ उत्पन्न होता है-

"ज्यों प्रतिलाभ लोभ अधिकाई "एवं उसकी आपूर्ति होने पर क्रोध होता है | अतएव वासना के उत्पन्न होते ही दुःख स्वयं साकार होकर आ जाता है | उससे कोई भी भौतिकवादी नहीं बच सकता |

वेदव्यासजी कहते हैं की-

"यत्पृथिव्यां व्रीहि यवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः |

नालमेकस्य पर्याप्तं तस्मात्तृष्णा परित्यजेत्" || (वेदव्यास)

अर्थात यदि विश्व के समस्त पदार्थ एक व्यक्ति को सहज में प्राप्त हो जायें तो भी वासनाओं का रोग उत्तरोत्तर बढ़ता ही जायेगा, पुनः साधारण सामग्री से वासनापूर्ति का लक्ष्य बनाना कितना हास्यास्पद है | भौतिकवादी कहते हैं की देखो हमने अपने भौतिकवाद की कितनी उन्नति की है | हमारे लिए जल, थल, नभ सर्वत्र मार्ग खुल गया है, हम जहाँ व्हहे जायें | हमें बड़े-बड़े हायड्रोजन बम आदि बना लिए हैं | अनेक असाध्य कहलाने वाले लक्ष्यों को सुख-साध्य बना लिया है पहले लोग जंगली थे, अब परम सभ्य बन गयेहैं | पहले लोग शरीर के रोग से अधिक दुखी थे, अब रोगो पर कंट्रोल हो गया है इत्यादि | उपर्युक्त बातें  अक्षरश: सत्य हैं | हम उसके आगे और भी मानने  को तैयार हैं | किन्तु भौतिकवादी क्या मेरे इस प्रश्न का उत्तर दे सकते है कि  उपर्युक्त समस्त उन्नतियों के परिणामस्वरुप अन्तरंग सुख-शांति की झांकी की झलक भी क्या प्राप्त हुई है ? क्या सत्य, अहिंसा, मानवता आदि में उन्नति हुई है ? क्या एक व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक में कहीं अन्तरंग शान्ति की झलक भी दिखाई पड़ी है ? यदि नहीं तो उपर्युक्त वास्तु की उन्नति धोखा नहीं तो क्या है ? वर्तमान भौतिकवाद की वास्तु सम्बन्धी उन्नति से सुख-शान्ति की कितनी अवनति हुई है यह सर्वानुभू विषय है आज तक एक भी विशेषज्ञ यह कहने को तैयार नहीं है की कल विश्व भौतिकवाद की उन्नति का ग्रास न बन जायेगा | जब भौतिकवाद की उन्नति का यह परिणाम है कि वह भौतिकवादी को ही भक्षण करना चाहता है तो फिर सुख-शान्ति का स्वप्न तो करोड़ो कोस दूर की बात है |

भावार्थ यह कि भौतिकवाद कि उन्नति से अन्तःकरण की शुद्धी सर्वथा असम्भव है और उसके बिना सुख-शान्ति की आशा करना नितान्त पागलपन है |

अतएव केवल भौतिकवाद के उत्थानमात्र से अन्तरंग सुख-शान्ति की समस्या नहीं हल हो सकती | जैसे सर्वसाधन-सम्पन्न महल में एक पागल खड़ा कर दिया जाये तो वह भौतिकवाद एवं वादी दोनों का सत्यानाश कर देगा | वैसे ही यदि अन्तःकरण के विचार शुद्ध न होंगे तो भौतिकवाद उलटे सर्वनाश में ही समर्थ होगा | सुख-शान्ति अन्तरंग ही होती है, अतः वह कैसे प्राप्त होगी| अतएव वासनाओं के अनुसार पदार्थ देकर उसे पूरा करने का लक्ष्य सर्वथा गलत है | इतना अवश्य है कि शारीरिक अवश्यकताओं की पूर्ति के हेतु भौतिकवाद सर्वथा ग्राह्य है | अब अध्यात्मवाद पर विचार कीजिये |

वेद कहता है- "रसो वै सः रसाग्वंह्येवायं लब्ध्वाssनन्दी भवति"

अर्थात ईश्वर ही आनन्द  है, उसे ही प्राप्त करके जीव आनन्दमय हो सकता है |

"तमेव विदित्वातिम्रित्युमेति नान्यः पन्था विध्यतेsयनाय"

अर्थात उसको जानकर ही दुःखार्णव से जीव उत्तीर्ण हो सकता है, अन्य कोई भी मार्ग नहीं है| किन्तु प्रश्न यह उपस्थित होता है कि क्या ईश्वर नाम का कोई तत्व है ? और यदि है तो क्या वेदादि में लिखा है इसलिए उसे मान लिया जाये या कोई ठोस प्रमाण है ? प्रत्यक्षवादी कहते हैं कि हम तो बिना किसी तत्व को प्रत्यक्ष किये नहीं मानते क्योंकि हम अन्धविश्वासी नहीं हैं | अतः अब ईश्वरवादी एवं प्रत्यक्षवादी के मध्य एक विषम समस्या आ गयी,उसे निबटाना है |

जरा प्रत्यक्षवादी महोदय से पूछिए कि आपने अपने आपको देखा है ? उत्तर मिलेगा 'नहीं' क्योंकि जीवात्मा तो सूक्ष्म है उसका साक्षात्कार महात्माओं को ही हो सकता है | तो फिर प्रत्यक्षवादी अपने को क्या मानता है ? पुनः प्रत्यक्षवादी से पूछिए की आपने अपनी बुद्धि, अपने मन आदि को देखा है ? उत्तर मिलेगा 'नहीं' ,क्योंकि सूक्ष्म मन बुद्धि का भी साक्षात्कार सर्वसाधारण को असंभव है | अच्छा, प्रत्यक्षवादी महोदय, आप केवल "प" अक्षर का ज्ञान ही प्रत्यक्षवाद से प्राप्त कर लीजिये | यह भी असम्भव है, क्योंकि अक्षरों का उच्चारण एवं पहिचान शब्द प्रमाण माने बिना असम्भव  है | भावार्थ यह कि प्रत्यक्षवादी अपने प्रत्यक्षवाद से एक अक्षर का भी ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता | अच्छा, तुम अपने प्रत्यक्षवाद से अपने बाप को सिद्ध कर सकते हो ? उत्तर मिलेगा | "नहीं" क्योंकि तब तो हम ही नहीं थे | तो तुम अपने आप को, अपने बाप को एवं अपने मन बुद्धि आदि को भी सिद्ध नहीं कर सकते तो तुम कैसे प्रत्यक्षवादी हो | अच्छा, चक्षुरिन्द्रिय से अणु इन्द्रिय-शक्ति को देख सकते हो ? नहीं | तो तुम प्रत्यक्षवाद से कैसे सब कुछ सिद्ध करना चाहते हो ? अच्छा,तुमने जब सर्वप्रथम किसी देश या वस्तु को देखा था तो उसके पूर्व तो उसका प्रत्यक्ष नहीं था, फिर तुमने उसे मानकर कैसे तदर्थ प्रयत्न किया था ? अच्छा, तुम खाना कहते हो, पानी पीते हो, वायु सेवन करते हो, तो सब को पहले विज्ञान से परीक्षण करके तब सेवन करते हो क्या ? सरे राष्ट्रों का संचालन क्या प्रत्यक्षवाद से हो सकता है ? क्या तुम किसी बात को बिना प्रत्यक्ष किये नहीं मानते ? यदि ऐसा है तब तो मेरी राय से सर्वप्रथम तुम्हे मस्तिष्क का इलाज कराना पड़ेगा पश्चात प्रत्यक्षवादी या कोई अन्य वाद-वादी बन सकते हो|

अच्छा, यह बताओ कि शब्द का प्रत्यक्ष आँख से कर सकते हो ? यदि नहीं,तो क्यों ? इसलिए कि शब्द आँख का विषय नहीं है| अच्छा, जब कान का विषय आँख से हल नहीं हो सकता तो इन्द्रियों से परे मन का विषय किसी इंद्रिय से कैसे हल होगा ? एवं मन से परे बुद्धि का विषय मन से कैसे हल होगा ? एवं बुद्धि से परे का विषय बुद्धि से कैसे हल होगा ?

ईश्वर यद्यपि अनुमान का भी विषय नहीं है, फिर भी किसी सीमा तक अनुमान से समझा जा सकता है, यथा-

१ संसार का व्यवस्थित रूप देख कर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसी सुव्यवस्था किसी शासन से ही संभव है और वह शासन सर्वशक्तिमान ईश्वर का ही हो सकता है, क्योंकि मनुष्य तो उसकी व्यस्वस्था को समझने में भी असमर्थ पाया जा रहा है |

२ सूर्याचन्द्राादि लोको का निर्माण विशिष्ट विज्ञानी भी नहीं कर सकता | निर्माण तो दूर की बात है, उसकी तह का भी परिज्ञान दुःसंभव हो रहा है|

३ सूर्यचन्द्रादि नियमित रूप से नियम में आबद्ध हैं , इनका नियन्ता अवश्य कोई सर्व-समर्थ ईश्वर है |

४ पृथ्वी आदि के धारण करने से प्रयत्नवान ईश्वर सिद्ध होता है |

५ नियम का निर्माता अवश्य होगा | एवं उसका प्रयोग करने वाला भी कोई सर्वज्ञ ईश्वर अवश्य होगा |

विश्व में कोई कार्य तभी सम्भव होता है | जब उसके उपकरण, करता ज्ञान, इच्छा, कृति, चेष्टा, क्रिया आदि सब संयुक्त होते हैं | इतने विलक्षण जगत् के निर्माण में भी उपर्युक्त सभी साधनों की आवश्यकता है और वह ईश्वर से ही सम्भव है यदि कोई कहे कि हमारी प्रकृति में ही हम उपर्युक्त समस्त शक्तियों को मानते हैं तब तो उसका "नेचर" शब्द ईश्वर का पर्यायवाची ही सिद्ध हुआ | फिर तो कोई विवाद ही नहीं है,| हम लोग जैसे 'कृष्णाय नमः' , 'वासुदेवाय नमः' कहा करते है, वैसे ही 'नेचराये नमः' कहा करेंगे | हमारे ईश्वर के तो 'अनन्तनामरूपाय' के अनुसार असंख्य नाम हैं  एवं असंख्य रूप हैं | किन्तु यदि प्रकृति जड़ है तो उसमें सृष्टि करने की शक्ति नहीं हो सकती | अतः सृष्टि आदि के लिए ईश्वर को मानना ही पड़ेगा|

हमारे यहां न्याय-वैशेषिकादि दर्शन शास्त्रों ने अनुमान-प्रमाण से यह सिद्ध किया है की सृष्टि को देखकर यह अनुमान किया जाता है की इसका स्रष्टा अवश्य कोई न कोई सर्वसमर्थ, सर्वशक्तिमान भगवान् है | क्योंकि दो प्रकार के कार्य होते हैं एक प्राणीकृत अर्थात मानवकृत, दूसरे ईश्वरकृत | इनमे मनुष्यकृत कार्य तो आप लेग जानते ही हैं, प्रतिदिन करते ही हैं, किन्तु जो कार्य मनुष्य नहीं कर सकता, वह ईश्वरकृत कहलाता है जैसे, नदी, पहाड़, चन्द्र, सूर्यादि लोक-निर्माण |

"न प्राणिबुद्धिभ्योsसंभवात्"

तर्क यह देते हैं कि - "पर्वतों वहिमान धूमवत्वात्" अर्थात जैसे किसी पर्वत पर धुआं  दिखाई पड़ता है तो अनुमान लगाया जाता है कि उस पर्वत पर आग अवश्य है, क्योंकि यह नियम है कि जहाँ-जहाँ धुआँ होता है, वहाँ-वहाँ आग अवश्य होती है |

यह अनुभव की बात सर्वमान्य है कि किसी भी कार्य की सिद्धि में कई कारणों की आवश्यकता है | जैसे,एक घड़े के निर्माण में यदि कोई प्रश्न करे कि घड़ा कैसे बना तो साधारण उत्तर यह भी हो सकता है कि मिटटी से बना | किन्तु क्या मिट्टी स्वयं घड़ा बन गयी ? तब दूसरा विशेष उत्तर दिया जाता है कि नहीं, मिट्टी,दंड,चक्र आदि उपकरण भी हों एवं घड़ा बनाने वाला कुम्हार भी हो, तब घड़ा बनता है | किन्तु यदि अच्छे ढंग के घड़े के बनाने की योग्यता किसी कुम्हार में न हो तो भी घड़ा नहीं बन सकता | भावार्थ यह कि घड़ा बनाने की योग्यता भी होनी चाहिए | किन्तु फिर भी घड़ा न बनेगा क्योंकि योग्यता होते हुए भी यदि इच्छा न की जाय, संकल्प न किया जाये, चेष्टा न की जाय तब भी घड़ा न बन सकेगा | भावार्थ यह कि घड़ा बनाने में मिट्टी आदि साधन भी अपेक्षित है, कुम्हार भी अपेक्षित हैं घड़ा बनाने का ज्ञान,घड़ा बनाने की इच्छा, घड़ा बनाने का संकल्प एवं घड़ा बनाने की चेष्टा, ये सभी अपेक्षित हैं , अन्यथा एक छोटा सा घड़ा भी नहीं बन सकता |

अब सोचिये कि जब एक घड़े के बनने के हेतु उपर्युक्त ६ कारणों की अपेक्षा है तब इतने विलक्षण विश्व के बनने में इन कारणों की अपेक्षा क्यों न होगी | जब विश्व का चित्र भी बिना किसी चित्रकार के बनाये नहीं बन सकता और यदि कोई कहे कि यह विश्व का चित्र अपने आप बन गया तब बुद्धिमान व्यक्ति उस वक्त को पागल कहेगा, तब भला विश्व अपने आप कैसे बन सकता है ? अतएव दर्शन शास्त्र अनुमान-प्रमाण के द्वारा ईश्वर-सिद्ध करते हैं एवं सृष्टि स्रष्टा ईश्वर को ही बनाते है |

आधुनिक भौतिक विज्ञान ने यहाँ तक सिद्ध किया है कि परमाणु तो विद्दुत्कलास्वरूप हैं, स्थूल भौतिक पदार्थ नहीं हैं | साथ ही वे परमाणु किसी अव्यक्त, अज्ञात शक्ति की स्पन्दन क्रियाएं हैं | अब आप समझ गये होंगे कि भौतिक विज्ञान जिस तत्व को अज्ञात, अव्यक्त शब्द से पुकारता है, वह क्या हो सकता है ? हमारा वेद भी ईश्वर को-                                    अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्म

प्रत्ययसारं प्रपंचोपशमं शान्तं शिवमद्धैतम् || (वेद )

अर्थात अज्ञात, अव्यक्त ही कहता है | प्रख्यात वैज्ञानिक प्रो० एनडींटन कहता है कि कोई अज्ञात, अव्यक्त कारण ही किसी अज्ञात क्रिया में काम कर रहा है किन्तु हम उसके विषय में कुछ नहीं जानते | किसी-किसी ऐसे अज्ञात मूलतत्व का सामना कर पड़ता है जो भौतिक जगत् से अतीत है | अब आप सोंचे कि भौतिकवाद कितना अपूर्ण एवं खोखला है | उस अज्ञात तत्व को अज्ञात शब्द से पुकारने मात्र से खोज समाप्त नहीं मानी जाती | उस अज्ञात तत्व की खोज करनी होगी | तब "विज्ञान" कहलायेगा अन्यथा तो वह अज्ञान ही रहेगा |

कुछ भौतिकवादी कहते है कि परमाणुओं से ही सृष्टि होती है, ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं | वे लोग गम्भीरता से सोंचे कि संयोग तो प्रदेश वाले पदार्थो का ही होता है, निरवयव, निष्प्रदेश परमाणुओं का परस्पर सम्बंद कैसे होगा एवं बिना उनके परस्पर संयोग के सृष्टि कैसे होगी ? यदि यह भी मान लिया जाय कि परमाणुओं का संयोग हो जाता है, यह नियम विपरीत बात भी हो जाती है, तो भी एक गम्भीर समस्या समक्ष आती है वह यह कि एक सेकण्ड में एक लाख मील भागने वाले परमाणु अपना ज्ञान दूसरे परमाणु में कैसे दाल सकते है और फिर चैतन्य कैसे स्थिर रह सकता है, जब कि ५० वर्ष की पढ़ी हुई चीज बुद्धिमान कहलाने वाले मनुष्य को भूल जाती है | यदि यह भी मान लिया जाये तो भी एक गम्भीर समस्या सामने आती है, वह यह कि परमाणुओं का प्रवृत्ति स्वभाव माना जाये या निवृत्ति स्वभाव माना जाये, या दोनों ही स्वभाव माने जायें या दोनों ही न मानें जायें | यदि प्रवृत्ति स्वभाव माना जाये तब तो सृष्टि हो जायगी पर प्रलय कैसे होगा ? जबकि क्लासियस के ताप सिद्धान्त के द्वारा एवं आज के वैज्ञानिकों के सिद्धांत द्वारा भी यह निर्विवाद सिद्ध है कि एक दिन प्रलय हो जायेगा, पृथ्वी ठंडी पड़ जाएगी, सब जीव समाप्त हो जायेंगे |

 

यदि परमाणुओं का निवृत्ति स्वाभाव माना जाये तब प्रलय तो सिद्ध हो जायेगा किन्तु प्रमुख प्रश्न तो यह है कि वर्तमान सृष्टि कैसे हुई अर्थात सृष्टि का प्रश्न कैसे हल होगा | यदि परमाणुओं का स्वभाव दोनों ही माना  जाये तो विरोधी स्वभाव होने के कारण न सृष्टि होगी न प्रलय | यदि परमाणुओं का दोनों ही स्वाभाव न माना जाये तो ईश्वर की आवश्यकता स्वभावतः सिद्ध है क्योंकि उन परमाणुओं को कण्ट्रोल करने वाला ईश्वर अवश्य है |

एक दार्शनिक सिद्धान्त यह भी सर्वमान्य है, उस पर भी गम्भीर विचार अपेक्षित है | वह यह कि रूपवान् कार्य का कारण सूक्ष्म एवं नित्य होता है और कार्य उससे अधिक स्थूल एवं अनित्य होता है | जैसे वस्त्र को ही ले लीजिये | वह सूत की अपेक्षा स्थूल एवं अनित्य है | इस नियमानुसार यदि परमाणु रुपवान् है तब उनका भी कोई कारण होगा जो सूक्ष्म एवं नित्य होगा | बस वही तो ईश्वर है |

एक प्रश्न और भी विचारणीय है कि उन परमाणुओं में गंधादि गुण मानने पड़ेंगे अन्यथा उन परमाणुओं से बानी हुई पृथ्वी आदि में गन्धादि गुण कहा से आएंगे | अब यह विचार कीजिये कि क्या सब परमाणुओं में एक ही गुण है यदि एक ही गुण माने तो गंध-रसादी की उत्पत्ति कैसे होगी ? यदि सब परमाणुओं में समता माने तो जल में भी गंध होगी एवं तेज में भी गंध-रसादि होंगे, यहाँ तक वायु में भी रस-गंधादि होने लग जायेंगे |

भावार्थ यह है कि परमाणुओं के संयोग से सृष्टि मानना भोलापन है कुछ लोग कहते है कि घड़ी अपने आप चलती है ऐसे ही सृष्टि भी अपने आप हो जाएगी, किन्तु उन्हें सोचना चाहिए कि घड़ी पूर्व में नहीं चलती थी जब किसी ने उसे बनाया तब चलने लगी एवं पश्चात् भी नहीं चलेगी अर्थात नष्ट हो जाएगी, तब फिर बनानी पड़ेगी | इसके अतिरिक्त यह भी विचारणीय है कि घड़ी बनाने वाले ने घड़ी तो बनायी है किन्तु उस घड़ी के लौह परमाणुओं की क्रिया को घड़ीसाज़ नहीं जानता अर्थात् उस पर कण्ट्रोल नहीं कर सकता | उसे कण्ट्रोल करने वाला ईश्वर है | अतएव ईश्वर को सर्वव्यापक होना पड़ता है अन्यथा वे परमाणु ठीक रूप से काम नहीं कर सकते |

ईस्वी सन् से ५०० वर्ष पूर्व यूनान में कुछ दार्शिनक हुए है, जिन्होंने सृष्टि का कारण प्रकट किया है थैलीज़ ने कहा कि सृष्टि का आदि कारण जल है | एनेक्सीमैंडर ने कहा पृथ्वी, जल आदि कारण नहीं हैं अपितु कोई अनियत द्रव्य है जिससे पृथ्वी, जल आदि का सृजन होता है |

एनेक्सीमैनीज ने कहा यह भी ठीक नहीं है | सृष्टि का मूल तत्व वायु है | वायु से ही सृष्टि का निर्माण हुआ है | एनेक्सीगोरस ने कहा यह भी ठीक नहीं है वस्तुतः अनेक तत्वों के मिश्रण एवं ईश्वरेच्छा से सृष्टि हुई है | पिथागोरस ने कहा एक संख्या से अनेक की उत्पत्ति हुई है |

अब आप एक और विलक्षण सिद्धान्त सुन लीजिये जिसे सुन कर आप हसेंगे | उन महाशय का नाम डार्विन है | उन्होंने कहा अमीवा कीड़े से विकास होते-होते रेंगने वाले, फिसलने वाले, फिर मछली, फिर पक्षी, पशु, बन्दर, वनमानुष और फिर मनुष्य बने अर्थात मनुष्यों के पूर्वज बन्दर हैं | उनका कहना है अमीवा कीड़ा स्वयं दुगुना हो गया तो हाइड्रा बन गया | इसी प्रकार विकास होते-होते मनुष्य बन गया | लन्दन के म्युजियम में इस विकास क्रम को दिखाने के लिए विभिन्न अस्थि-पंजर रखे हुए हैं |

अब थोड़ा विचार कीजिये | बीज़ से अंकुर एवं फूल से फल बनने का विकास-युक्त क्रमिक नियम पहले भी था तो आज भी है | फिर मछली से मछली हाथी से हाथी बनने का नियम आज क्यों है ? फिर तो आज भी कबूतर से हाथी पैदा होना चाहिए | वह क्रमिक नियम कहा नष्ट हो गया | आज तो कबूतर से कबूतर ही पैदा होते हैं | मनुष्य से मनुष्य ही पैदा होते हैं  |

पुनश्च विकासवादियों से कोई पूछे कि यह बताओ कि हड्डी रहित अमीवा आदि जीवों से हड्डीयुक्त पशु-पक्षी आदि कैसे बन गए तो वे उत्तर देते हैं कि मानसिक प्रेरणा से ही हड्डी बन गयी अब जरा सोचिये हड्डी से मन का तो कोई सम्बन्ध नहीं है, दाँत भी हड्डी ही तो है, उसमे सुई चुभाओ कोई कष्ट नहीं होता |

पुनः वे दूसरा उत्तर देते हैं कि  कठोर काम करने से हड्डी बन गयी | अब जरा सोचिये कि कठोर काम करने से बहिरंग घट्टे पड़ सकते हैं, बाहरी काठिन्य हो सकता है, हड्डी कैसे बनेगी ? क्या लोहार आदि के हाथ में हड्डी अधिक बन जाती है ?

पुनः वे तीसरा उत्तर देते है कि नस-नाड़ी इकठ्ठी होकर हड्डी बन गयी | किन्तु यह तो और भी हँसी की बात है | क्योंकि यदि नस-नाड़ी इकट्ठी होकर दाँत बन जाती है तो फिर दूध के दाँत गिर जाने पर पुनः दाँत कैसे आते हैं ? यदि वे कहें कि नस-नाड़ी तो असंख्य हैं पुनः दाँत बन जाती हैं, तब यह प्रश्न अत है कि पुनः दूसरी बार दाँत गिरने पर बुढ़ापे तक दाँत क्यों नहीं आते | क्या बूढ़े की नस-नाड़ी समाप्त हो जाती हैं ?

अब उनका अंतिम उत्तर सुनिए | वे कहते है परिस्थितिवश हड्डी बन गयी | परिस्थिति का उत्तर तो घोर पागलपन का है | क्योंकि देखिये एक ही परिस्थिति में भाई-बहिन पैदा हुए किन्तु बहिन के दाढ़ी मूछ नहीं होती | हाथी और हथिनी एक परिस्थिति में हुए लेकिन हथिनी के बड़े दाँत नहीं होते | मोर एवं मयूरी एक ही परिस्थिति में हुए किन्तु मयूरी की लम्बी पूछ नहीं होती | मुर्गा-मुर्गी एक ही परिस्थिति में हुए किन्तु मुर्गी के सिर पर कलगी नहीं होती | इतना ही नहीं, विकासवाद के अनुसार क्रमिक विकास में प्राणियों के दाँतो में कोई भी मेल जोल नहीं है | देखिये गाय भैंस के ऊपरी दाँत नहीं होते किन्तु घोड़े के निचे ऊपर दोनों दाँत होते हैं | पुनः कुत्ते को देखिये, उसके दूध के दाँत नहीं गिरते और देखिये घोड़े के स्तन नहीं होते, बैल के स्तन अण्डकोष के पास होते हैं | बच्चा पैदा होते समय घोड़ी की जीभ बाहर गिर जाती है |

पुनः देखिये क्रमिक विकास का खोखला तर्क | स्याही के दस स्तन होते है, उससे उन्नत होकर चुहिया बानी उसके आठ ही स्तन रह गये | पुनः उन्नत होकर बिल्ली बानी तो ६ स्तन ही रह गये | पुनः उन्नत होकर गाय भैंस बानी उसके चार ही स्तन रह गये | सबसे उन्नत मनुष्य के दो ही रह गये | क्या बढ़िया विकास है ? और भी देखिये गाय-भैंस आदि के बाल आजन्म एक रंग के होते हैं किन्तु मनुष्य के बाल लड़कपन में सुनहरे रंग के, युवावस्था में काले रंग के, वृद्धावस्था में सफ़ेद रंग के, अति-वृद्धावस्था में पिंगल रंग के हो जाते हैं| पुनः पशु को तैरने की स्वाभाविक योग्यता होती है किन्तु उससे विकसित मनुष्य को यह सब सीखना पड़ता है | और देखिये, पशु आड़े शरीर के होते हैं, वृक्ष उलटे शरीर के होते हैं, मनुष्य सीधे शरीर के होते हैं | यह कौन सा क्रमिक विकास है | वृक्ष दूषित खुराक, गन्दी चीजें ग्रहण करते हैं एवं उससे पुष्ट होते हैं किन्तु अच्छी वायु फेंकते हैं,  अच्छे फल फूल आदि देते हैं | विकास में विपरीत हो गया कि मनुष्य अच्छी खुराक,अच्छी वायु आदि से पुष्ट होते हैं किन्तु गन्दी वायु आदि फेंकते हैं |

पुनः आयु का क्रमिक विकास देखिये | कछुवे की आयु १५० वर्ष, सर्प की १२० वर्ष, उससे विकास होने पर कबूतर की आयु ८ वर्ष की रह गयी | एक हंसी की बात और सुनिए कि ८० मन की छिपकली मानी गयी है, उसकी हड्डी लन्दन के म्यूजियम में रखी है | जबकि अस्थि-पंजर ८० मन का है तो उसका वजन २०० मन होगा | जब छिपकली २०० मन की है तब मनुष्य को कम से कम ८००० मन का होना चाहिए | दूसरी बात यह कि डार्विन के मत में पेड़ इतने बड़े माने गये हैं कि जंगल के जलने पर कोयले की खान बन गयी तब तो आदमी को ५० मंजिले मकान से भी बड़ा होना चाहिए |

अब थोड़ा पृथ्वी की आयु पर विभिन्न वैज्ञानिकों के विचार सुन लीजिये | प्रथम रसायन शास्त्री लोग सृष्टि के मूल तत्व ९२ मानते थे अब एक ही मानते हैं | हेकल आदि डार्विन के अनुयायियों का कहना था कि संसार को बने ८ लाख २० हज़ार वर्ष हुए हैं जब कि भूगर्भ-शास्त्री लोग कहते हैं कि १० करोड़ हुए | प्रो० पेरी ने रेडियम की खोज द्वारा यह बताया है कि पृथ्वी की आयु १० करोड़ वर्ष से भी अधिक है | अब सोचिये इसमें क्या सही है ? और यदि हम प्रत्यक्षवाद से सिद्ध करें तो आप चकित रह जायेंगे | अभी कुछ दिन पूर्व नेवादा में मिस्टर जान टी० रोड ने खुदाई में एक जूते की आय ६० लाख वर्ष घोषित की है जिसकी सिलाई बहुत अच्छी है अर्थात् ६० लाख वर्ष पूर्व मनुष्य पूर्ण विकसित था | अब सोचिये उस पूर्ण विकास में भी तो कम से कम ५० लाख वर्ष लगे होंगे |

 

भावार्थ यह कि इस प्रकार उस जूते के सिद्धान्तानुसार एक करोड़ वर्ष के मनुष्य हुए | विकासवादियों, हेकल आदि के मतानुसार अमीवा से २१ कड़ी बाद मनुष्य बना अर्थात यदि १ कड़ी में १ करोड़ वर्ष भी मान लें तो २१ करोड़ वर्ष अमीवा को हुए हुआ होगा | करोंड़ों वर्ष बाद अमीवा हुआ होगा | इस प्रकार २२ करोड़ वर्ष तो कम से कम हुए जब कि हेकल ८ लाख २० हजार वर्ष बताता है | यह सब तीर तुक्का है | वस्तुतः शास्त्रीय दृष्टि से संसार १ अरब ९५ करोड़ कुछ लाख वर्ष का है १४ मनु की आयु में ४ अरब ३२ करोड़ वर्ष होते हैं | ब्रम्हा की आयु ५० वर्ष बीत चुकी है, ५० बाकि हैं | यदि किसी एक कुएं में बैलगाड़ी मोटर, रॉकेट, आदि डाल दिए जाएं तो जब कभी पृथ्वी से वे खोदे जायेंगे तब किस उन्नति का अनुमान किया जायगा ?

आज का वैज्ञानिक सिद्धान्त ही डार्विन, हेकल आदि की मखौल उड़ाता  है और कहता है बंदर से मनुष्य नहीं उत्पन्न हुए अपितु मनुष्य से बंदर उत्पन्न हुए हैं | प्राचीनकाल में मनुष्य ने विज्ञान में बहुत उन्नति की इसलिए दिमाग कमजोर हो गया अतएव वे जंगली वनमानुष बंदर आदि बन गये | ध्यान देने की बात है कि  अब पुनः विज्ञानं की अंतिम सीमा आ गयी है, अतएव विज्ञानी लोग सावधान हो जायें, उन्हें वनमानुष एवं बन्दर बनना पड़ेगा | कहाँ तक कहें, स्वयं डार्विन के पुत्र जार्ज डार्विन ने १६ अगस्त १९०५ में कहा कि किसी भी जीवन-कार्य की संगति भौतिकवाद से नहीं हो रही है | यहाँ तक कि आँसु तक को सिद्ध नहीं कर पाये | कुछ वर्ष पूर्व इंग्लैण्ड की विज्ञान सभा में डाक्टर ला की बात दोहराई गयी कि आधुनिक विज्ञान की सबसे बड़ी खोज यही है कि हम लोग अभी तक कुछ नहीं खोज पाये अर्थात मूलतत्व नहीं समझ पाये |

डार्विन को यह संदेह था कि ईश्वर यदि होता और दयालु होता एवं सर्वशक्तिमान होता, जेएस कि आस्तिक लोग कहते हैं तो वह दुःखमय संसार न बनाता | इतना ही नहीं यदि ईश्वर ने संसार बनाया है तो यह शंका भी स्वभावतः आती है कि ईश्वर ने जीवों को भी बनाया होगा और यदि जीवों को भी बनाया है तो फिर जीव नित्य,अनादि, अज आदि नहीं हैं | पुनः वेद-शास्त्र से घोर विरोध हो जायेगा | वेद कहता है -

"अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बहृी: प्रजा: स्रजमानां सरूपाः |

अजो ह्येको जुषमाणोsनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोsन्यः ||"

"ज्ञाज्ञोो द्धावजा" .............

गीता कहती है-

"ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः |

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि “||

रामायण भी कहती है-

" ईश्वर अंश जीव अविनाशी | चेतन अमल सहज सुखराशी ||"

इन दोनों शंकाओं का समाधान सुनिए - ईश्वर ने संसार बनाया ही नहीं | तब तो नास्तिक कहेंगे -बस यही तो हम भी कह रहे थे | किन्तु उससे आगे और सुनिए - ईश्वर ने संसार को प्रकट किया है- नवनिर्माण जीवात्माओं का नहीं किया है | जीव तो अनादिकाल से हैं एवं उनके अनन्तानन्त कर्म भी साथ में हैं किन्तु ईश्वर ने उन्हें प्रकट कर दिया जिससे वे अपनी मुक्ति के हेतु प्रयत्न करें | इसी से वेद कहता है-

'सूर्यचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत् दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथोस्व: '

अर्थात जिस प्रकार पूर्व-सृष्टि थी उसी प्रकार ईश्वर ने कल्पना की | बस कल्पना करते ही विश्व बन गया | जब पूर्व क्रमानुसार ही विश्व प्रकट किया गया तब यह प्रश्न  हो गया कि जीव को ईश्वर ने नया-नया बनाया | सृष्टि शब्द का अर्थ ही यह है 'सृज विसर्ग' अर्थात छोड़ना | जन्म का अर्थ भी यही है 'जन्प्रादुर्भावे अर्थात प्रकट होना | अर्थात जन्म या सृष्टि नव-निर्माण के बोधक शब्द नहीं हैं | जल में जैसे बिजली थी उसे प्रकट किया गया उसी प्रकार प्रलयकाल में ब्रह्मस्थ जीवों को पुनः प्रकट किया गया और जिस योग्यता में प्रलय हुआ था उसी में वे पुनः खड़े कर दिए गए | जिस प्रकार पूर्व-असमाप्त क्रिकेट-मैच यथापूर्व आरम्भ हो जाता है | स्पेन्सर हेमिल्टन आदि का तर्क है- यदि ईश्वर संसार से बहार है तो  स्वतन्त्र हो सकता है किन्तु तब उसे संसार का ज्ञान कैसे होगा और यदि वह संसार में कार्य करता है तो अनन्त, अचिन्त्य, शक्तिमान, भगवन को सीमित शक्ति में उतारना भोलापन है और फिर सबसे प्रमुख बात तो यह है कि बिना ईश्वर के व्याप्त हुए अचेतन प्रकृति में नियमित एवं ज्ञानपूर्वक विकास असम्भव है |

कुछ लोग कहते है अचेतन तृण से दूध एवं दूध से दही आदि बन जाता है, इस प्रकार बिना ज्ञानादि शक्ति के सृष्टि हो जाती है |  किन्तु यह तर्क भी भोलापन का है क्योंकि यदि तृण से दूध बन जाता तो बैल तो तृण खाता है उससे दूध क्यों नहीं बनता ? इसके अतिरिक्त तृण खाने वाली गाय चैतन्य होती है | अपने आप कभी तृण दूध बना है ?

कुछ लोग कहते हैं कि ईश्वर एवं प्रकृति मिल कर सृष्टि करते हैं,ऐसा मान लिया जाये | किन्तु ऐसा मानने में ईश्वर अपूर्ण एवं सदोष सिद्ध होगा | सांख्य दर्शन का सिद्धान्त तो अकर्ता एवं अप्राकृत सिद्ध करने मात्र का है |

कुछ लोग कहते हैं कि ईश्वर तो चैतन्य है फिर उससे जड़ विश्व कैसे बन सकता है | किन्तु उन्हें जानना चाहिए कि चैतन्य मनुष्य से ही बाल एवं नखादि कैसे होते हैं | पुनः मायाधीश ईश्वर के लिए क्या कठिन है |

कुछ लोग कहते हैं कि समन्वय कर दिया जाये अर्थात चेतन का रचयिता चेतन ईश्वर एवं जड़ का कारण प्रकृति मान ली जाये | किन्तु ऐसा मानने पर चेतन विकारी सिद्ध होगा | कुछ लोग कहते है कि काल को सृष्टिकर्ता मान लिया जाय, ईश्वर की क्या आवश्यकता है ? यह प्रश्न भी बड़ा व्यापक है, किन्तु ध्यान रखना चाहिए कि काल की उत्पत्ति तो ईश्वर से ही होती है -

अक्षरात् संजायते कालः |

पुनश्च गीता कहती है-

द्धाविमौ पुरषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च |

क्षर सर्वाणि भूतानि कूटस्थोsक्षर उच्यते ||

कुछ लोग कहते हैं कीकर्म को सृष्टि का कारण मान लेना चाहिए किन्तु यह तो सर्वथा असम्भव है क्योंकि कर्म जड़ है तथा चित् के अधीन भी है |

कुछ लोग कहते हैं कि जीव को सृष्टिकर्ता मान लेना चाहिए | किन्तु यह भी असम्भव है क्योंकि जीव अल्पज्ञ है, साथ ही पराधीन है | यदि जीव स्वाधीन होता तो स्वयं कर्म को क्यों भोगना चाहता ?

कुछ लोग अन्त में कहते हैं कि जीवन्मुक्त परमहंस जो "ब्रह्मविद ब्रह्मैव भवति" के अनुसार ब्रह्म हो जाते हैं, उनसे उनसे सृष्टि मान ली जाये, किन्तु वेद कहता है "जगद्व्यापारवर्जम्" संसार आदि बनाने का कार्य परमहंस भी नहीं कर सकते | उनकी ब्रह्म से एकता तो केवल "भोगमातृसाम्यलिङ्गाच्च" के अनुसार ब्रह्मानन्द भोगने के दृष्टिकोण से ही मानी गयी है |

भावार्थ यह कि सृष्टिकर्ता ईश्वर को मानना ही होगा यह तर्क शास्त्र एवं युक्ति सभी से सिद्ध है किन्तु वेदान्त-शास्त्र कहता है कि यद्द्यपि तर्क से तुम लोग सिद्ध करते हो किन्तु ईश्वर-सिद्धि तर्क का विषय नहीं है | वेद में लिखा है इसलिए ईश्वर को मान लेना चाहिए | जिसे न मानना हो या शंका हो वह वेद के अनुसार साधना कर के देख ले | यदि ईश्वर-प्राप्ति न हो तभी उसे यह कहने का अधिकार है कि ईश्वर नहीं है| अस्तु, यह ईश्वर की सिद्धि हुई |

यहाँ पर एक प्रश्न यह भी उत्पन्न होता है कि भगवान् सर्वव्यापक हैं तो फिर उसका हमें अनुभव क्यों नहीं होता | रसगुल्ला खाते हैं, चीनी खाते हैं, तो तो हमें उसकी मिठास का अनुभव होता है फिर प्रत्येक परमाणु में व्याप्त आनन्दमय भगवान् के आनन्द का हमें अनुभव क्यों नहीं होता ? दूध पिने में दूध का अनुभव होता है, विष खाने में विष का अनुभव होता है, उसी प्रकार भगवान् का भी अनुभव हमें होना चाहिए | आप लोगों का दावा है कि अनुभव में आने वाली वास्तु ही आप मान सकते हैं| अनुभव प्रमाण ही आपको मान्य है| किन्तु अनुभव प्रमाण सबसे निर्बल प्रमाण है | पीलिया रोग के रोगी को सर्वत्र पीला ही पीला दीखता है किन्तु उसका अनुभव भ्रामक है | साँप के काटे हुए व्यक्ति को नीम मीठा लगता है | इसी प्रकार भाव-रोग से ग्रस्त जीव को किसी भी वास्तु का अनुभव भ्रामक ही होता हैं | एक चींटी चीनी के पहाड़ पर चक्कर काटकर लौटी और उससे पुछा गया तो उसने अनुभव यह बताया कि यह पर्वत नमकीन था | बड़ा आश्चर्य हुआ किन्तु जब जाँच हुई तो पता चला कि चींटी के मुख में नमक की डली रखी हुई थी| अस्तु, सर्वत्र शक्कर के ढेर पर भ्रमण करते हुए भी उसे अपने मुख में रखे हुए नमक का ही स्वाद अनुभव में आया | उसी प्रकार जिस इन्द्रिये, मन बुद्धि से हम संसार को ग्रहण करते हैं वे सब प्राकृत, ,मायिक, त्रिगुणात्मक एवं सदोष हैं और भगवान् प्राकृत्यतीत, दिव्य गुणातीत एवं दोषरहित है, फिर हम इनसे उसके ठीक स्वरुप को किस प्रकार से पहिचान सकते हैं | जब तक ये दिव्य न हो जायें, इनका अनुभव सही कदापि नहीं हो सकता |

"सर्व खल्विदं ब्रह्म" | "ईशावास्यमिदग्गंसर्वम् | "

"सियाराम-मय सब जग जानी |"

"प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना "|

यह सब सत्य होने पर भी सदोष इन्द्रिय, मन बुद्धि का अनुभव गलत होना स्वाभाविक है | विवेकानन्द, तुलसी, सूर, मीरा आदि का पीलिया रोग अच्छा हो गया था | अस्तु, उन्हें सर्वत्र ब्रह्म के आनन्दमय स्वरुप का अनुभव हो रहा था,किन्तु जब उन्होंने अपना सत्य-अनुभव हमें बताया तो हमने उनको नहीं माना और उनकी खिल्ली उड़ाई

भगवान् दो विरोधी धर्मो का अधिष्ठान है इसलिए उसे समझने में कठिनाई होती है | किन्तु उसे प्राप्त किया जा सकता है और वह वही कर सकता है जिस पर उसकी कृपा हो जाय | उसकी कृपा से ही प्राकृत इन्द्रिय मन, बुद्धि को दिव्यता प्राप्त हो जाती है जिससे दिव्य ईश्वर ग्राह्य हो जाता है |

विश्व का प्रत्येक जीव आस्तिक ही है | वह करोड़ों कल्प परिश्रम करके भी नास्तिक नहीं बन सकता क्योंकि प्रत्येक अनीश्वरवादी आनन्द को तो मानता ही है और आनन्द ईश्वर का पर्यायवाची है | अतएव आनन्दोपासक स्वयं ही ईश्वरोपासक सिद्ध हो जाता है | उसका ईश्वरीय गुणों में प्रेम भी ईश्वर को सिद्ध करता है | यहाँ तक कि उसकी स्वयं सत्ता ही ईश्वर को सिद्ध करती है |

वाल्मीकि के कथनानुसार-

" लोके नहि स विध्येत यो न राममनुव्रतः "|

अर्थात विश्व में एक भी जीव ऐसा नहीं जो राम का अनुयायी न हो | यह पृथक बात है कि हम उनकी प्राप्ति का ठीक मार्ग न जानते हों अतएव प्रयत्न विपरीत हो रहा हो, किन्तु ईश्वर को तो मानते ही हैं |

यदि कोई कहे कि मेरी प्रतिज्ञा है कि मैं ईश्वर का विरोध करूँगा तब तो वह प्रकांड आस्तिक है | जैसे हमारे यहाँ हिरण्यकशिपु आदि हुए | वे प्रकांड आस्तिक इसलिए हैं की विरोध तो किसी सत्ता से ही हो सकता है | यदि ईश्वर न होता तो वे विरोध किससे करते | पुनः यह भी इतिहास-सिद्ध बात है कि उन राक्षसों को ईश्वर-प्राप्ति भी हुई | क्योंकि उपासना का अभिप्राय ही यह है कि किसी भी भाव से मन को ईश्वर में एक कर देना | वह चाहे अनुकूल भाव से हो अथवा प्रतिकूल भाव से हो-

" कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहार्दमेव च |

नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ||"(वेदव्यास)

इस वेदव्यासोक्ति के अनुसार काम से, क्रोध से, भय से, स्नेह से, सौहार्द से, ऐक्य से, जैसे कैसे भी ईश्वर में मन एक कर देने से ईश्वर की ही प्राप्ति होगी | फिर वह प्रकांड आस्तिक यानि मायातीत महापुरुष स्वयं सिद्ध है | उसे नास्तिक कहना स्वयं की नास्तिकता का घोतक है इसके अतिरिक्त कर्म जड़ हैं, वे स्वयं फल नहीं बन सकते | उनको ठीक समय में फल रूप में देने का काम सर्वज्ञ ईश्वर ही कर सकता है | जीव प्रथम तो अल्पज्ञ है, उसे अनन्त जन्मों के अपने कर्मो का ज्ञान नहीं है | दूसरे यदि हो भी जाये तो अपने विरुद्ध कौन कर्मफल भोगना चाहेगा ? अतएव ईश्वर को कर्मफल-दाता मानना पड़ेगा | ऐसा न्यायदर्शन का भी मत है |

वस्तुतस्तु ईश्वर की सिद्धि प्रत्यक्ष एवं अनुमान इन दोनों ही प्रमाणों से पूर्णतया नहीं हो सकती | अतएव वेदान्त ने शब्द-प्रमाण से ही ईश्वर को सिद्ध किया है | प्रायः भोले लोग कहते हैं कि शब्द-प्रमाण तो साधारण प्रमाण है, अनुभव प्रमाण ही सत्य है | किन्तु उन्हें यह जानना चाहिए कि अनुभव तो साधना के पश्चात् ही होता है | शब्द को साधना के पूर्व मानना ही पड़ेगा | पुनः यदि अनुभव-प्रमाण माना जाये तब तो संसार का भी कार्य असिद्ध हो जायेगा | यथा एक पित्त-रोगी मीठी चीनी को कड़वी अनुभव करता है | एक पीलिया का रोगी श्वेत वास्तु को पीली देखता है | सर्प का कांटा हुआ व्यक्ति कड़वी नीम को मीठी अनुभव करता है | चींटी नमक के डले को मुँह में रखकर चीनी के पहाड़ पर भी चक्कर लगाकर उस पहाड़ को नमकीन ही अनुभव करती है, भावार्थ यह कि अनुभव यदि उस कक्षा का न हुआ तो धोखा हो सकता है | अतएव शब्द-प्रमाण के द्वारा ही अनुभव करने पर वास्तविक तत्व का साक्षात्कार हो सकता है |

यदि शास्त्रों-वेदों के अनुसार ईश्वर-प्राप्ति की साधना करने पर ईश्वर-सिद्धि न हो तभी यह कहने का अधिकार है कि ईश्वर नहीं है | भौतिक जगत् की सिद्धि के हेतु भी प्रथम साधना ही की जाती है अन्यथा वैज्ञानिक क्यों साधना करे, जितना अनुभव है उसके आगे न माने | पर ऐसा नहीं हैं, वे कहते हैं कि साधना के पश्चात् ही किसी तत्व को सिद्ध अथवा असिद्ध किया  जा सकता है, प्रथम तो मानना पड़ेगा |

यदि कोई कहे कि ठीक है, ईश्वर होगा, किन्तु उसका उपासना आदि करने से क्या अभिप्राय है | जैसे अपने देश में कोई अध्यक्ष होता है उसी प्रकार ईश्वर भी सम्पूर्ण विश्व का अध्यक्ष होगा | किन्तु यह बात नहीं है | क्योंकि देश के अध्यक्ष से हमारे नाते सीमित ही हैं और उस ईश्वर से हमारे नाते पूर्ण हैं | पुनः हम स्वार्थी हैं, हमारा स्वार्थ जहाँ भी सिद्ध होगा वहीँ हमारा स्वाभाविक प्रेम हो जायेगा | यह अनुभूत बात है | हम वास्तविक नित्य असीम आनन्द चाहते है और ऐसा आनन्द एकमात्र ईश्वर में ही है | अतएव ईश्वर में हमारा घनिष्ठतम सम्बन्ध हैं | यदि हमें आनन्द की प्राप्ति अन्यत्र कुत्रापि हो सकती तो ईश्वर से हमारा सम्बन्ध देश के अध्यक्ष के समान ही रहता | आप ईश्वर की प्राप्ति के विषय में चिन्तित न हों, वह सर्व-सुलभ है | मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि उसकी प्राप्ति में कोई साधना ही नहीं करनी है | आप कहेंगे यदि साधना नहीं करनी है तो अब तक आनन्द-प्राप्ति क्यों नहीं हुई ? हाँ, यह प्रश्न ठीक है | यही सब तो समझना है | थोड़ा धैर्य रखिये सब समझ में आ जायेगा | अब ईश्वर के स्वरुप पर विचार करना है | क्योंकि वेद के अनुसार-

" इह चेदशकद्दबोध्दुं, प्राक्शरीरस्य विस्रसः |

ततः सार्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते || "

अर्थात मानवदेह पाकर यदि ईश्वर को नहीं जाना तो पुनः चौरासी लाख योनियों में चक्कर लगाना होगा | उससे बड़ी कोई भूल न होगी | अतएव मानवदेह का महत्त्व समझ कर ईश्वर को समझना है जिससे हम अपने परम चरम लक्ष्य परमानन्द को प्राप्त कर सकें |

लेखक :- जगद्गुरु श्री १००८ स्वामी कृपालु जी महाराज

Comments

  1. राधे राधे गुरुदेव महाराज जी के चरणो में मेरा कोटि कोटि प्रणाम

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  2. राधे राधे

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