भगवत्कृपा / god's grace
भगवत्कृपा
वेद ने बताया कि-
नायमात्मा
प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष
वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणते तनुश्रस्वाम् ।। ( क ० १-२-२३ )
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः
। ( क ०
१-२-२० )
अर्थात् उसे उच्चतम इन्द्रिय , मन , बुद्धि भी यद्यपि
नहीं ग्रहण कर सकते किन्तु वह जिस पर कृपा कर देता है एवं कृपा द्वारा अपनी दिव्य शक्ति
प्रदान कर देता है वह बड़भागी जीव उस अज्ञेय ईश्वर को पूर्णतया जान लेता है एवं उस
अदृष्ट ईश्वर का पूर्णतया दर्शन कर लेता है । इसी आशय से गीता कहती है
तत्प्रसादात्
परां शान्ति स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् । ( गी ० १८-६२
)
अर्थात् अर्जुन ! तुम ईश्वर की कृपा से परमशान्ति
एवं उसके शाश्वतानन्दमय दिव्यधाम को प्राप्त कर सकते हो । इसके अतिरिक्त जब अर्जुन
को पूर्णज्ञान हो गया एवं अज्ञान का अत्यन्ताभाव हो गया तब भी उसने यही कहा था कि-
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत
। ( गी ० १८।७३ )
अर्थात् आपकी कृपा से ज्ञान
हुआ एवं अज्ञान सदा के लिए समाप्त हो गया । यह ध्यान रहे कि ज्ञान पर अज्ञान का अधिकार
कभी नहीं हो सकता , जैसे प्रकाश पर अन्धकार का अधिकार असम्भव है । अब पुराणों में आइये
। वेदव्यासजी कहते हैं - अथापि ते देव पदाम्बुजद्वयप्रसादलेशानुगृहीत
एव हि ।
जानाति तत्त्वं भगवन्महिम्नो न चान्य एकोऽपि चिरं
विचिन्वन् । ।
( भा ० १०-१४-२९ )
अर्थात् उस ईश्वर
को युगों तक परिश्रम करके भी कोई नहीं जान सकता किन्तु उस ईश्वर की जिस पर कृपा हो
जाती है वह उसे पूर्णतया जान लेता है एवं कृतार्थ हो जाता है । रामायण भी यही कहती
है कि -
सोइ
जानइ जेहि देहु जनाई । जानत तुमहिं तुमहिं है जाई ।।
तुम्हरिहिं कृपा तुमहिं रघुनन्दन । जानत भगत भगत
उर चन्दन ।।
राम
कृपा बिनु सुनु खगराई । जानि न जाइ राम प्रभुताई ।।
माया - निवृत्ति के सम्बन्ध में भी रामायण का मत है कि
–
सो
दासी रघुबीर की समुझे मिथ्या सोपि ।
छुटै
न राम कृपा बिनु नाथ कहौं पद रोपि ।।
भ्रम-निवृत्ति के विषय में भी रामायण ने बताया कि –
रजत सीप महँ भास जिमि, यथा भानु कर वारि ।
यदपि मृषा तिहुँ काल महँ , भ्रम न सके कोउ टारि ।।
जासु कृपा अस भ्रम मिटि जाई । गिरिजा सो कृपालु रघुराई
।।
मानस-रोग-निवृत्ति के लिए भी –
राम
कृपा नासहिं सब रोगा ।
सत्संग के लिए भी रामायण ने बताया कि-
बिनु सत्संग विवेक न होई । राम कृपा बिनु सुलभ
न सोई ।।
अब
मोहिं भा भरोस हनुमन्ता । बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं सन्ता ।। सन्त विशुद्ध मिलहिं
पुनि तेही । राम कृपा करि चितवहिं जेही ।।
भावार्थ यह कि वेद से लेकर
रामायणपर्यन्त सर्वसम्मति से यह निश्चित हुआ कि ईश्वर कृपा के बिना हमारी आत्यन्तिक - दुःख - निवृत्ति भी नहीं हो
सकती एवं परमानन्द प्राप्ति भी नहीं हो सकती ।
अब विचार यह करना है कि जब ईश्वर कृपा से ही सब कुछ
होना है तो हम लोगों की छुट्टी है । जब वह कृपा करेगा तब सब काम स्वयमेव ठीक हो जायगा
, साधनादि का परिश्रम व्यर्थ ही है । एवं इसी आशय से विश्व के अधिकांश प्रिय महानुभाव
यह कह दिया करते हैं कि उस ईश्वर की इच्छा के बिना कुछ नहीं हो सकता । उसकी इच्छा बिना
पत्ता नहीं हिल सकता , उसे जैसा करना होता है , करता है । अतएव हम से यदि कोई अनाचार
, दुराचार , पापाचार आदि भी होता है तो वही जिम्मेदार है , हम तो निर्दोष हैं ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि
यन्त्रारूढ़ानि मायया ।
ईश्वरः
सर्वभूतानां , हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।।
उमा
दारु जोषित की नाईं । सबहिं नचावत राम गुसाईं ।।
आदि के अनुसार हम एक यन्त्रारूढ़
कीट के समान हैं , वह जैसा करता है वैसा ही हम करते जाते हैं । यह सिद्धान्त महान्
सर्वनाश करने वाला भी है एवं महान् उत्थान करने वाला भी है , अतएव इस पर गम्भीरतापूर्वक
विचार करना होगा ।
( १ ) सर्वप्रथम यह विचार
कीजिये कि ईश्वर सर्वज्ञ है या अल्पज्ञ है । वेद ने कहा है ।
' यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । '
अर्थात् ईश्वर सर्वज्ञ है
। अब यह सोचिये कि यदि ईश्वर सर्वज्ञ है और वही हमारा संचालक है अर्थात वही हमारे प्रत्येक
कार्य का कर्ता है तो हमारे द्वारा अल्पज्ञता के कार्य क्यों होते हैं ?
( २ ) यह सोचिये कि यदि
ईश्वर कर्ता है तो हम अपने आपको कर्ता क्यों महसूस करते हैं , फिर तो हमें अशान्त ही
न होना चाहिए ?
( ३ ) यदि ईश्वर कर्ता है
तो वही भोक्ता होना चाहिए या अपने आपको उसे क्षमा कर देना चाहिए किन्तु हमें तो भोक्ता
न बनाना चाहिए । यह तो साधारण मनुष्य भी न करेगा कि कार्य स्वयं करें एवं फल दूसरा
भोगे । देवदत्त खाना खाय एवं विष्णुदत्त का पेट भरे या देवदत्त खाना खाय , विष्णुदत्त
उल्टी करे , यह कैसे होगा ?
( ४ ) यदि ईश्वर कर्ता है
तो उसने अपना विधान , अर्थात् वेदों में जीवों के लिए कार्याकार्य का विधान निर्माण
क्यों किया , फिर तो वह यह कह देता कि जीवों को कुछ नहीं करना है , मैं जैसा चाहूँगा
कराऊँगा?
( ५ ) यदि ईश्वर कर्ता समदर्शी
है तो एक को प्रह्लाद आदि का परम पद देकर सदा के लिए आनन्दमय कर दिया एवं दूसरे को
काम , क्रोध , लोभादि के पिटारे में बन्द करके वासनाओं की दासता भोगवा रहा है , ऐसा
अन्याय कैसे हो सकता है ? पुनश्च ८४ लाख योनियों का विधि - निर्माण ही क्यों करता
?
( ६ ) यदि कहो कि यह तो
ईश्वर का अभिनय मात्र है , सुख , दुःख जीव को मिलता ही नहीं है , तब तो हमें ब्रह्म
- ज्ञानादि की आवश्यकता ही नहीं है ।
उपर्युक्त दोषारोपण के परिणामस्वरूप
यह निश्चय हुआ कि यदि हम ईश्वर को कर्ता मानते हैं तो ईश्वर कोई आततायी तत्त्व सिद्ध
होगा एवं साथ ही हमारी उच्छृङ्खलता उत्तरोत्तर बढ़ती जायगी ; हम आलसी बनते जायेंगे
एवं हमारी प्रत्येक क्रिया पैशाचिक होने लग जायगी । ऐसे ही हम पर्याप्त उच्छृङ्गल हैं
फिर ईश्वर को कर्ता मानना तो महान् पतनकारक है ।
कुछ लोग कहते हैं ईश्वर
तो निर्दोष है , वह कर्ता नहीं है , किन्तु हमारे भाग्य ही का दोष है । जैसा भाग्य
में लिखा है , ईश्वर वैसा ही कराता है । अतएव भी हम निर्दोष हैं -
हरिणापि
हरेणापि ब्रह्मणापि सुरैरपि ।
ललाटलिखिता
रेखा परिमार्टुन शक्यते ।।
किन्तु ऐसे भाग्यवादी सर्वप्रथम
विचार करें कि भाग्य क्या तत्त्व है । वे कहेंगे ' पूर्वजन्मकृतं कर्म तदैवमिति कथ्यते ' अर्थात् पूर्व जन्मों के किये
गये पुरुषार्थ पश्चात् जन्म में भाग्य कहलाते हैं । भावार्थ यह कि भूतकाल के कर्म भविष्य
काल में भाग्य की संज्ञा पा जाते हैं । इसका अभिप्राय यह हुआ कि हमने भूतकाल में पुरुषार्थ
किया है । भूतकाल में हम पुरुषार्थ करने में स्वतन्त्र थे , केवल वर्तमान में ही ईश्वर
का नियम बदल गया कि हम पुरुषार्थ नहीं कर सकते । क्या हँसी की बात है ! हमारा पिछला
जन्म भी तो उस समय वर्तमान ही था । तब भी हमें यही कहना चाहिए था कि वर्तमान में कर्म
नहीं कर सकते और यदि सदा यही कहना चाहिये था तो किस भूतकाल में कर्म किया जिसका फल
अनंत भविष्य काल तक भोगना पड़ रहा है ? यदि भूत में कर्म
किया है तो आज भी कर सकते हैं, यदि आज नहीं कर सकते तो भूत में भी न किया होगा, यह
तो साधारण बुद्धि वाला भी समझ सकता है | अतएव भाग्य के नाम पर उच्छृङ्खलता
करना और भी नासमझी है । वेद - शास्त्र या लोक भी यह नहीं कहता कि तुम्हें कुछ नहीं
करना है , बस भाग्य के अनुसार सब होता जायगा । हम सांसारिक कार्यों में न ईश्वर को
कर्ता मानकर अकर्मण्य बनते हैं और न भाग्य को समक्ष रख कर आलसी ही बनते हैं । वहाँ
तो धन , पुत्रादि के हेत प्रतिक्षण द्रुतगति से प्रयत्नशील हैं , किन्तु ईश्वर - प्राप्ति
के विषय में यह सिद्धान्त मान लिया जाता है कि हमें कुछ करना नहीं है ।
कुछ लोग काल को दोष देकर
उच्छृङ्खल हो जाते हैं । उनका कहना है कि समय सब करा लेता है । कुछ लोग परिस्थिति की
ओट लेकर कि परिस्थिति से मनुष्य पापकर्मादि करता है , ऐसा कह कर पापाचार में प्रवृत्त
होते हैं । किन्तु यह सब अपनी नासमझी का परिणाम है । वस्तुतः ईश्वर , भाग्य , कालादि
का कोई दोष नहीं है । हम आपको एक आश्चर्य बतायें । कतिपय देशों में परिस्थितिवश पाप
करने का सिद्धान्त है जिन्हें हम प्रकांड नास्तिक मतावलम्बी कहते हैं , कुछ देश ईश्वरेच्छावादी
हैं जिन्हें हम प्रकाण्ड आस्तिक देश कहते हैं । किन्तु न तो उस नास्तिक देश में और
न इस आस्तिक देश के इतिहास में ही कभी ऐसा हुआ कि लोगों को अपराध का दण्ड न दिया जाये
, क्योंकि नास्तिक के मत से परिस्थिति ही दोषी है एवं आस्तिक के मत से ईश्वरेच्छा ही
दोषी है । भावार्थ यह कि अपने दोषों को छिपाने एवं बढ़ाने के दृष्टिकोण ही कतिपय भोले
लोगों ने वास्तविक सिद्धान्त का अनर्थ किया है । वस्तुतः व्यक्ति ही कार्याकार्य का
जिम्मेदार है । तुलसीदासजी कहते हैं कि –
नर
तनु भव वारिध कहँ बेरो । सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो ।। कर्णधार सद्गुरु दृढ़ नावा ।
दुर्लभ साज सुलभ करि पावा ।।
जो
न तरइ भवसागर , नर समाज अस पाइ ।
सो
कृतनिन्दक मन्द मति , आतम हन गति जाइ ।
सो
परत्र दुख पावइ , सिर धुनि धुनि पछिताय ।
कालहिं
कर्महिं ईश्वरहिं , मिथ्या दोष लगाय ।।
अर्थात् वह आत्मा का हनन करने वाला है जो काल , कर्म , ईश्वर को दोषी ठहरा कर मनमाना पाप करता है । उसे इस लोक में भी सुख - शान्ति नहीं मिल सकती एवं परलोकादि के सुखों की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती । अतएव सिद्ध हुआ कि ईश्वर - कृपा की ओट में अकर्मण्य बने रहना यह सर्वाधिक सर्वनाश का मार्ग होगा । अतएव यह अनुमान लगाया जा सकता है कि ईश्वर - कृपा भी किसी आधार पर आधारित है । वह किसी कारण की अपेक्षा रखती है , बस कारण जो भी हो । जिसने उस कारण की पूर्ति कर दी उस पर ईश्वर की कृपा हो गयी और वह कृतार्थ हो गया । वे ही सन्त महात्मा हैं ।…...
लेखक:- जगद्गुरु श्री १००८ स्वामी कृपालु जी महाराज |

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