शरणागति/ surrender

पुनः वेदों में चलिये । वेद कहता है- 

यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ।

 तह देवमात्मबुद्धि प्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ।। ( श्वे ० ६-१८ )

 ' देवप्रसादाच्च '

     अर्थात् हम उस परमेश्वर की शरण में हैं , जिसकी कृपा से आत्मा एवं बुद्धि में प्रकाश प्राप्त होता है , जो ब्रह्मा आदि का सृष्टिकर्ता है । भावार्थ यह कि शरणागति से ही उसकी कृपा हो सकती है । गीता कहती है - 

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । 

तत्प्रसादात् परां शान्ति स्थान प्राप्स्यसि शाश्वतम् ।। ( गी ० १५ - ६२ ) 

अर्थात् हे अर्जुन ! तू उसी ईश्वर की शरण में जा तब उसकी कृपा होगी , तब तू मेरा परम - धाम एवं परम शान्ति प्राप्त कर सकेगा , क्योंकि-

 दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । 

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ।। ( गी ० ) 

अर्थात् मेरी दैवी त्रिगुणात्मिका माया को वही पार कर सकता है जो केवल मेरी ही शरण में आता है । वेदव्यास कहते हैं कि-

 तस्मात्त्वमुद्धवोत्सृज्य चोदनां प्रतिचोदनाम् । 

प्रवृत्तं च निवृत्तं च श्रोतव्यं श्रुतमेव च । 

मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम् । ( भा ० ११-१२ - १४ ) 

    अर्थात् हे उद्धव ! तू अनेक प्रकार के त्रिगुणात्मक कर्म प्रपंच को छोड़ कर केवल मेरी शरण में आ जा क्योंकि सभी आत्माओं का परम आत्मा मैं हूँ । तभी तू निर्भय होकर मायातीत हो सकता है । रामायण कहती है - 

" मन क्रम वचन छाँड़ि चतुराई । भजतहिं कृपा करहिं रघुराई ।। 

    अर्थात् सर्वात्म - समर्पण से ही माया से मुक्ति एवं भगवत्कृपा का लाभ हो सकता है । भावार्थ यह कि हमें ईश्वर के शरणागत हो जाना है । ऐसी शरणागति के आधार पर ही ईश्वर - कृपा निर्भर है । जो जो जीवात्माएँ उसके शरणागत हो गयीं , वे वे अपने परम - चरम - लक्ष्य परमानन्द को प्राप्त कर चुकीं , जो जो शरणागत नहीं हुई हैं उन्हीं के ऊपर ईश्वर की कृपा नहीं हुई एवं वे ही अपने लक्ष्य से वञ्चित होकर ८४ लाख योनियों में काल , कर्म , स्वभाव , गुणाधीन होकर चक्कर लगा रही हैं । 

फिरत सदा माया कर प्रेरा । काल कर्म स्वभाव गुन घेरा ।। 

    अब एक प्रश्न यह उपस्थित होता है कि यह तो सांसारिक सौदा हो गया कि हमने कुछ दिया तब ईश्वर ने कृपा की । किन्तु ऐसा समझना भोलापन है , क्योंकि शरणागति का अभिप्राय ही यह है कि हम कुछ न करें । कुछ न करने का नाम ही शरणागति है । जब तक नवजात बालक कुछ नहीं करता तब तक माँ सब कुछ करती रहती है ; जब बालक कुछ कुछ करने लगता है तो माँ भी कुछ कुछ करना कम कर देती है ; जब बालक सब कुछ करने लगता है तब माँ कुछ नहीं करती । बस यही उदाहरण प र्याप्त है । जब तक हम कर्तृत्वाभिमान रखते हैं तभी तक हमें कर्मबन्धन है एवं हम कर्ता घोषित किये जाते हैं , जहाँ हमारा कर्तापन समाप्त हुआ हम अकर्ता सिद्ध हो गये और-

 तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् । 

    इस गीतोक्ति के अनुसार हमारा योग - क्षेम ईश्वर वहन करने लगा । अतएव यदि कुछ न करने रूपी शरणगति से माया से मुक्ति , त्रिगुण , त्रिकर्म , त्रिताप , पंचकोशादि से मुक्ति , परमानन्द , परम शान्ति की प्राप्ति हो जाय तो इससे बड़ी कृपा और क्या मानी जायगी ? यदि हम कुछ भी करते एवं पुनः ईश्वर की कृपा होती तब तो कुछ कहने का अवसर था किन्तु शरणागति से अर्थात् सब कुछ समर्पित कर देने से सब कुछ प्राप्त हो जाना अकारण - कृपा ही है । सब कुछ समर्पित करने में हमारा क्या परिश्रम है ? एक पक्षी अपनी चोंच में मांस का टुकड़ा लिये जब तक भागता है , अन्य पक्षी उसका पीछा करते हैं एवं वह एक क्षण को भी चैन नहीं पाता है । जैसे ही वह सब कुछ समर्पित कर देता है बस अवकाश प्राप्त कर लेता है । भावार्थ यह है कि ईश्वर कृपा का कोई मूल्य भी देना चाहे तो असम्भव है क्योंकि जो वस्तु ईश्वर देते हैं वह दिव्य है एवं जो मूल्य जीव देगा वह प्राकृत एवं सदोष ही होगा । पुनः ईश्वर को उस प्राकृत वस्तु से क्या अभिप्राय है । 

    जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था , द्रौपदी ने प्रथम पाँचों पतियों का बल मस्तिष्क में रखा । जब वे पति मौन हो गये तब बड़े - बड़े धर्माचार्य - द्रोणाचार्य , कृपाचार्य , विदुर , भीष्म पितामह आदि का अवलम्ब सोचने लगी । जब उधर से भी निराशा हुई तब अपने दाँत से साड़ी दबायी । तब भी भगवान् नहीं आये । जब दुःशासन के एक ही झटके में दाँत से साड़ी नीचे गिरी तब पूर्णतया शरणागत हो गयी , यानी सब कुछ करना , सोचना बंद कर दिया । सब काम बन गया । भगवान् गीता में कहते हैं - 

सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ( गी ० ) 

    अर्थात् अर्जुन ! तू धर्माधर्म के चक्कर को छोड़कर केवल मेरी ही शरण में आजा तो मैं न्यायी भगवान् अपने न्याय को समाप्त करके कृपा द्वारा तेरे समस्त जन्मों के समस्त पापों को क्षमा कर दूँगा । सोचिये यदि कोई अपराधी शरण में भी जाता है तो भी कोर्ट पिछले अपराधों का दंड देती है . किन्तु ईश्वर इतना कृपामय है कि यदि तुम एक बार पूर्ण शरणागत हो जाओ तो अनन्त जन्मों के अनन्तानन्त शुभाशुभ कर्मों से मुक्त करके अर्थात् क्षमा करके भविष्य में अनन्त काल के लिये योगक्षेम वहन करते हुए परमानन्द प्रदान कर देगा । यह कृपा नहीं तो और क्या है ? अल्पज्ञ भी सोच सकता है । अतएव उपर्युक्त प्रश्न समाप्त हो गया कि ईश्वर मूल्य लेकर कृपा करता है । पुत्री के विवाह में केवल माँगने मात्र से बजाज का वस्त्र दे देना और उसके लिए कोई मूल्य कभी न माँगना कृपा है । धोबी का बिना मूल्य वस्त्र धोना , कृपा है । ईश्वर का धोयाः अन्तःकरण पुनः मैला नहीं होता है । पत्नी पति की शरण में आते ही पति की सारी संपत्ति की अधिकारिणी हो जाती है , परन्तु ईश्वर शरणागति उससे भी अत्युच्च है , ' तस्य कार्यं न वेद्यते । ' 

    अब यह विचार करना है कि शरणागति किसकी की जाय , हमारे पास शरीर है , इन्द्रियाँ हैं , मन आदि है । पंचदशी कहती है-

 मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।  

अर्थात् बन्धन एवं मोक्ष का कारण मन ही है । वेदव्यास कहते हैं-

 चेतः खल्वस्य बन्धाय मुक्तये चात्मनो मतम् । 

गुणेषु सक्तं बन्धाय रतं वा पुंसि मुक्तये ।। ( भा ० ३-२५-१५ ) 

    अर्थात् मुक्ति एवं बन्धन में मध्यस्थ कारण केवल मन ही है । अतएव हमें मन को ही ईश्वर के शरणागत करना है । मन के शरणागत होने पर सबकी शरणागति स्वयमेव हो जायगी । हम लोग शारीरिक क्रियादिकों से तो ईश्वर की शरणागति सदा ही करते हैं किन्तु मन की आसक्ति जगत् में ही रखते हैं अतएव मन की आसक्ति के अनुसार जगत की ही प्राप्ति होती है । यह अटल सिद्धान्त है कि मन की आसक्ति जहाँ होगी , बस उसी तत्त्व की प्राप्ति होगी । यदि हम शारीरिक कर्म अन्य करें एवं मानसिक आसक्ति अन्यत्र हो तो बस मन की आसक्ति का ही फल मिलेगा अर्थात् यदि शरीरेन्द्रियों से हम शुभ या अशुभ कर्म करें एवं मन से कुछ न करें , केवल ईश्वर - शरणागत ही रहें तो कर्म का फल न मिलेगा , केवल ईश्वरीय लाभ ही मिलेगा । अतएव मन की शरणागति ही वास्तविक शरणागति है । जैसे पैरों को बाँध कर माचिंग नहीं हो सकती , मुख बन्द करके स्पीच नहीं हो सकती , वैसे ही मन को अन्यत्र आसक्त करके ईश्वरोपासना भी नहीं हो सकती । वस्तुतस्तु मन की आसक्ति ही ईश्वरीय क्षेत्र में उपासना कहलाती है एवं जगत्क्षेत्र में आसक्ति कहलाती है । 

दुइ कि होहि इक संग भुआलू , हँसब ठठाइ फुलाउब गालू |  

    के अनुसार मन संसार में भी आसक्त हो एवं ईश्वरोपासना भी होती रहे , यह सर्वथा असम्भव है क्योंकि एक मन एक काल में एक ही क्षेत्र में आसक्त हो सकता है । फिर मायिक एवं ईश्वरीय क्षेत्र परस्पर विरोधी क्षेत्र भी हैं । एक कथानक आप लोगों ने सुना होगा , मथुरा के चौबों का । बस , उसी प्रकार जैसे चौबे भाँग के नशे में लौह श्रृंखला में नाव को बाँध कर सारी रात उसे खेते रहे , अन्ततोगत्वा प्रातःकाल अपने आपको उसी स्थान पर पाया , उसी प्रकार मन को धन , पुत्र , स्त्री , पति आदि में आसक्त करके ईश्वरोपासना अनन्तकाल तक करने पर भी अपने आपको मायिक जगत में ही पावेंगे । ईश्वरोपासना तो की ही नहीं , केवल शारीरिक रूप से ही पूजापाठ आदि किया , अतएव मन की आसक्ति का ही परिणाम प्राप्त होगा । गोपियों ने उद्धव से बड़ा ही सुन्दर कहा था , सूर के शब्दों में-

 ऊधो ! मन न भये दस बीस । 

एक हतो सो गयो श्याम संग को अवराधे ईस ।

    अर्थात् एक ही तो मन है , अगर अनेक मन होते तो एक मन को अन्यत्र एवं दूसरे को अन्यत्र एवं तीसरे को अन्यत्र लगा देते । इस प्रकार जगदुपासना एवं ईश्वरोपासना दोनों ही चलती रहतीं , किन्तु ईश्वर पहिले ही जानता था कि अगर दो मन भी दे दिये तो जीव ' मामेकं शरणं व्रज ' अर्थात् केवल मेरी ही उपासना न कर सकेंगे । अतएव मन की शरणागति ही ईश्वर शरणागति है , कर्म चाहे जो हों , उनसे कोई अभिप्राय नहीं । 

    अब यह विचार करना है कि मन की शरणागति में कठिनाई क्या है ? कठिनाई यह है कि चूँकि हमारा मन अनादिकाल से सांसारिक विषयों में ही आसक्त रहा है अतएव दृढ़मूल आसक्ति हो चुकी है । यदि हमारा मन , न संसार में आसक्त होता न भगवान् में आसक्त होता तब तो सुगमता होती । अतएव सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि हम संसार का वास्तविक स्वरूप समझें एवं वहाँ से मन को उदासीन करें , तभी ईश्वर - शरणागति सम्भव है ।......




लेखक:- जगद्गुरू श्री कृपालु जी महाराज 
 

 

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